कांशीराम स्मारक से उठी “नीली लहर” ने राजधानी को नीला कर दिया। रैली में कई लाख जुटे, मायावती हुईं गदगद ,भाजपा से नजदीकी और सपा से दूरी,किस नाम की है मजबूरी,राजनैतिक उत्थान पर मायावती का पैंतरा |

लखनऊ में विधानसभा भवन से तक़रीबन 10 किलोमीटर दूर खचाखच भरे कांशीराम स्मारक स्थल से उन्होंने अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को संबोधित किया.मायावती ने इस दौरान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की आलोचना की लेकिन यूपी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार का आभार जताया.मायावती ने मंच से एक बार फिर साफ़ किया कि 2027 का विधानसभा चुनाव बीएसपी अकेली लड़ेगी,राज्य में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में होने के साथ ही इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं. मायावती ने दोनों दलों पर तीखा हमला बोलकर यह संदेश देने की कोशिश की कि बीएसपी किसी भी ‘मोर्चे’ या ‘गठबंधन’ का हिस्सा नहीं बनने जा रही है.
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि, ”मायावती का बयान बीएसपी से ज़्यादा बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद है क्योंकि विपक्ष के वोट के बिखराव से बीजेपी को लाभ मिलेगा. लेकिन इस वक़्त मायावती का निशाना बिहार चुनाव है.अपने भाषण में कांग्रेस को ‘नाटकबाज़’ और सपा को ‘दलित-पिछड़ों का उत्पीड़क’ बता कर मायावती ने यह साफ़ किया है कि बीएसपी का फ़ोकस अपने पुराने जनाधार की वापसी पर ही रहेगा.”मायावती ने अपनी रैली में कहा कि समाजवादी पार्टी जब सरकार में रहती है, तब न उन्हें पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) याद आता है, न कांशीराम की जयंती और न ही उनकी पुण्यतिथि याद आती है,जबकि कांग्रेस नेता नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी इससे इनकार करते हैं, वो कहते हैं कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने कांशीराम की पुण्यतिथि पर होर्डिंग लगाए हैं,नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी पहले बीएसपी और कभी मायावती के अतिकरीबी हुआ करते थे,वो कहते हैं, ”कांशीराम जी के विचार सभी दलित शोषित समाज के लिए हैं, कांग्रेस ने विचार गोष्ठी भी की है.”मायावती ने इस रैली में बीजेपी की तारीफ़ भी की है,उन्होंने रैली में कहा, “मैंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) को लिखित चिट्ठी के ज़रिए कहा और आग्रह किया कि कांशीराम स्मारक में एंट्री टिकटों के पैसे को स्मारक और पार्कों के रखरखाव पर लगाया जाए.””उत्तर प्रदेश की वर्तमान बीजेपी सरकार ने इस मामले को संज्ञान में लेकर हमसे वादा किया कि जो भी पैसा टिकटों के ज़रिए आता है, वह इन स्थलों के रखरखाव के लिए लगाया जाएगा इसलिए हमारी पार्टी उनके प्रति आभार व्यक्त करती है.”इस बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बिना किसी का नाम लिए एक्स पर एक पोस्ट किया,उन्होंने लिखा, “क्योंकि ‘उनकी’ अंदरूनी सांठगांठ जारी है, इसीलिए वो हैं ज़ुल्म करने वालों के आभारी.”समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच रिश्ते तल्ख़ रहे हैं,हालांकि, दोनों पार्टियां मिलकर चुनाव भी लड़ चुकी हैं,समाजवादी पार्टी के नेता सुभास यादव कहते हैं बीएसपी बीजेपी को राजनीतिक संकट से बचाना चाहती है.उन्होंने कहा, ”बीजेपी पर जब भी संकट आता है तो वो कौन सा बटन दबाते हैं कि बीएसपी की चाल बदल जाती है.”अमरेन्द्र कुमार यादव उर्फ लाशू कहतें हैं “जब चीफ़ जस्टिस पर हमला हो रहा है, रायबरेली में दलित की जान ले ली गई पूरण सिंह आई पी एस सुसाईड कर लिए हैं,रोहित बेमुला को मार दिया गया,प्रतिदिन दलितों के साथ बर्बरता की जा राही है, उनकी हत्याएं की जा रहीं हैं, इस दौर में बीजेपी की तारीफ़ करना तार्किक नहीं लगता है, समाजवादी पार्टी की आलोचना वो पुरानी बातों को लेकर कर रही हैं.”वे खुन्नस में हैं,वर्तमान की जगह अतीत को वे ज्यादा याद कर रहीं हैं|
समाजवादी पार्टी के साथ बीएसपी का 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन था.
मायावती और मुलायम सिंह के बीच बाद में सुलह हो गई थी,मायावती ने सपा के लिए और मुलायम सिंह ने बसपा के लिए चुनाव प्रचार भी किया था जिसमें बसपा दस सीटें जीतने में कामयाब हुई थी वहीँ समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर सिमट गयी थी,वहीं गुरुवार की रैली में मायावती ने कहा है कि गठबंधन के अनुभव बीएसपी के लिए फ़ायदेमंद नहीं रहे, 1993 और 1996 के चुनावों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब भी बीएसपी ने दूसरे दलों के साथ हाथ मिलाया, पार्टी की सीटें और वोट शेयर दोनों घटे थे,1993 के चुनाव में बीएसपी ने सपा और 1996 में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था,अपने कार्यकर्ताओं से मायावती ने कहा, ”गठबंधन में बीएसपी का वोट तो दूसरे दलों को ट्रांसफ़र हो जाता है, लेकिन दूसरी पार्टियों का वोट उनकी पार्टी को नहीं मिलता है.”लेकिन समाजवादी पार्टी आंबेडकर नगर के वरिष्ठ नेता राम अर्ज यादव ने कहा, कि ”2019 के गठबंधन के इस चुनाव में बीएसपी के 10 सांसद जीते तो समाजवादी पार्टी के सिर्फ पांच ही लोकसभा तक पहुंच पाए, इस वक़्त समाजवादी पार्टी दलित शोषित और वंचित की लड़ाई के लिए कांग्रेस के साथ है, पहले भी कई दलों से इस वजह से गठबंधन किया था.’
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मायावती की सपा-कांग्रेस से नाराज़गी के बारे में बसपा के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि , ”मायावती के भाषण में अखिलेश यादव पर प्रहार और बीजेपी तथा योगी सरकार को धन्यवाद के दूसरे मायने नहीं निकाले जाने चाहिए क्योंकि रैली कांशीराम पर केंद्रित थी.”मायावती ने कांग्रेस को भी निशाना बनाया है,उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने देश में इमरजेंसी लगाकर संविधान और बाबा साहेब आंबेडकर के आदर्शों का अपमान किया था,मायावती ने कहा कि अब कांग्रेस नेता संविधान की प्रति लेकर “नाटकबाज़ी” कर रहे हैं,इसके जवाब में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी अविनाश पांडे ने मीडिया से कहा, ”इस देश को बाबा साहेब की अगुआई में संविधान कांग्रेस ने दिया है,पार्टी के नेता राहुल गांधी ने संविधान को बचाने के लिए 10 हज़ार किलोमीटर की पद यात्रा की है,जब इंडिया गठबंधन बन रहा था तो मायावती कहां थीं,इस प्रकार के बयान सिर्फ़ बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए है.” लोग कहते हैं, कि बीएसपी को असल डर कांग्रेस और सपा से ही है,वे कहते हैं , ”दलित मतदाता बीएसपी से पहले कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा है. इसलिए उनको डर है कि एक बार ये कांग्रेस की तरफ़ गया तो पलट कर आना मुश्किल है.”
सपा के पीडीए फॉर्मूला का प्रदर्शन भी लोकसभा में अच्छा रहा है. इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये भी एक वजह हो सकती है कि मायावती अपने समर्थकों से दोनों ही पार्टियों से समान दूरी बनाने के लिए कह रही हैं,मायावती की रैली में आकाश आनंद को ख़ास जगह दी गई है,इस रैली में मायावती के साथ बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद का भी संबोधन विशेष रूप से चर्चा में रहा है,आकाश आनंद ने कहा कि आरक्षण का पूरा लाभ समाज को नहीं मिल पा रहा है, उन्होंने दावा किया कि केवल बसपा सरकार ही दलितों और पिछड़ों को उनका हक़ दिला सकती है,आकाश आनंद ने अपने भाषण में कहा, “यूपी की जनता को मायावती की ज़रूरत है, जातिवाद से पीड़ितों को मान-सम्मान की ज़िंदगी मायावती ने दी है.”इस रैली में आईं अंबेडकरनगर की सुन्दरी कहतीं है, ”मायावती और आकाश आनंद दोनों ही पार्टी के नेता हैं,हम तो चाहते हैं कि 2027 में बहनजी की सरकार बन जाए.”विश्लेषक मानते हैं कि आकाश आनंद को सामने लाकर मायावती पार्टी में एक पीढ़ीगत बदलाव का संदेश दे रही हैं क्योंकि पिछले 13 साल में पार्टी का जनाधार कमज़ोर हुआ है,जिन तीन मुस्लिम नेताओं को मायावती के साथ जगह मिली है, उनमें मुनक़ाद अली, नौशाद अली और शमशुद्दीन राईन थे, इसके अलावा बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा और एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह भी थे, ”बीएसपी के पास यही तीन मुस्लिम नेता हैं, लेकिन बीजेपी की तारीफ़ करके मायावती ने मुसलमानों को और दूर कर दिया है,”बीएसपी को 2027 तक अपना जनाधार फिर से खड़ा करना होगा, वहीं यह भी साबित करना होगा कि मायावती की राजनीति अब भी प्रदेश में प्रासंगिक है|
रैली में उमड़ी भीड़ ने बीते कई वर्षों के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।बसपा नेताओं ने दावा किया कि करीब 5 लाख से अधिक कार्यकर्ता इस रैली में शामिल हुए। कांशीराम स्मारक से लेकर अवध चौराहा, तेली बाग, आलमबाग और तिकुनिया तक लोगों का सैलाब उमड़ा रहा। राजधानी के कई इलाकों में ट्रैफिक ठप हो गया और नीले झंडों से पूरा लखनऊ सज गया।अपने 45 मिनट लंबे संबोधन में मायावती ने सपा, भाजपा और कांग्रेस-तीनों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज को अब किसी के भरोसे नहीं रहना चाहिए। हमें बाबा साहेब अंबेडकर और कांशीराम का सपना साकार करना है। सत्ता की मास्टर चाबी हमें खुद अपने हाथ में लेनी होगी। मायावती ने विशेष रूप से मुस्लिम समाज को संबोधित करते हुए कहा कि “अब समय आ गया है कि दलित और मुस्लिम एकजुट होकर भाजपा और सपा की कथनी-करनी की राजनीति का जवाब दें।” उनके इस बयान ने सपा खेमे में बेचैनी बढ़ा दी है।राजधानी लखनऊ में बसपा की यह रैली पिछले नौ वर्षों में सबसे बड़ी बताई जा रही है। आखिरी बार 2016 में मायावती ने इतनी बड़ी भीड़ जुटाई थी। इस बार नज़ारा वैसा ही था – चारों ओर नीले झंडे, नीले बैनर और “जय भीम, जय भारत” के नारे। रैली स्थल के बाहर कार्यकर्ताओं ने जयकारों से माहौल को जोशीला बना दिया। राजनीतिक विश्लेषक डॉ. ए.के. मिश्रा ने कहा कि यह रैली बसपा के संगठनात्मक पुनर्जागरण का संकेत है। मायावती ने दिखा दिया कि बसपा का कैडर अभी भी जिंदा और वफादार है।”रैली के बाद लखनऊ के विभिन्न हिस्सों में बसपा कार्यकर्ता झंडे और बैनर लेकर सड़कों पर निकले। स्मारक स्थल के बाहर लगी नीली लाइटें और बसपा के झंडों से शहर का हर कोना “नीला” दिख रहा था। मायावती के भाषण के बाद कार्यकर्ताओं ने उन्हें “दलितों की शेरनी” और “बहुजन नायिका” कहकर संबोधित किया। बसपा की यह रैली दिखाती है कि मायावती अभी भी यूपी की राजनीति की सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं।

