सुप्रीम कोर्ट ने संविधान  के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए छोटे राज्यों में उपभोक्ता आयोगों के सुचारु संचालन को लेकर अहम निर्देश दिए हैं।सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन राज्यों में लंबित मामलों की संख्या काफी कम है और इस कारण पूर्णकालिक राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (State Consumer Disputes Redressal Commission) की स्थापना व्यवहारिक नहीं मानी जा रही है, वहां वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जा सकती है।कोर्ट ने आदेश दिया कि ऐसे राज्यों में उपभोक्ता अपीलों की सुनवाई संबंधित हाईकोर्ट के न्यायाधीश करेंगे, ताकि न्याय प्रक्रिया बाधित न हो और उपभोक्ताओं को समय पर राहत मिल सके।अदालत का मानना है कि न्याय तक पहुंच हर नागरिक का अधिकार है और प्रशासनिक या संरचनात्मक सीमाओं के कारण इसमें रुकावट नहीं आनी चाहिए। इस निर्देश का उद्देश्य न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाना है, विशेषकर उन राज्यों में जहां मामलों की संख्या सीमित है।सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ, जिसमें चीफ़ जस्टिस और जस्टिस जॉयमल्या बागची शामिल हैं, नामक स्वतः संज्ञान (suo motu) मामले की सुनवाई कर रही थी। अदालत ने इस दौरान यह तथ्य स्वीकार किया कि कुछ छोटे राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में उपभोक्ता मामलों की संख्या बहुत कम है, जिसके कारण वहाँ पूर्णकालिक राज्य उपभोक्ता आयोग का गठन व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है।अरुणाचल प्रदेश में कुल 59 मामले लंबित हैं।सिक्किम में जिला स्तर पर 52 और राज्य आयोग में केवल 12 मामले हैं।त्रिपुरा में चार जिला आयोगों में 316 मामले और राज्य आयोग में 46 मामले हैं, लेकिन आयोग का अध्यक्ष पद खाली है।अदालत ने इन कम संख्या वाले राज्यों के उपभोक्ता विवाद निवारण तंत्र की स्थिति को देखते हुए यह समझा कि जहाँ आयोगों की व्यावहारिक उपस्थिति नहीं है, वहाँ अदालती सुनवाई का वैकल्पिक प्रबंध किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष विभिन्न छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उपभोक्ता आयोगों की स्थिति का ब्यौरा रखा गया।आंकड़ों से स्पष्ट हुआ कि कई स्थानों पर मामलों की संख्या सीमित है और कहीं प्रशासनिक पद खाली पड़े हैं।त्रिपुरा में चार जिला उपभोक्ता आयोगों में कुल 316 मामले लंबित हैं, जबकि राज्य आयोग में 46 मामले हैं। हालांकि, राज्य आयोग के अध्यक्ष का पद अभी खाली है।मिजोरम में जिला स्तर पर 82 और राज्य स्तर पर 12 मामले लंबित हैं, जहां आयोग के सदस्य पूर्णकालिक नहीं बल्कि अंशकालिक रूप से कार्य कर रहे हैं।मणिपुर के जिला आयोगों में 123 तथा राज्य आयोग में 43 मामले विचाराधीन हैं।लक्षद्वीप में कुल लंबित मामलों की संख्या 10 से भी कम है और वहां राज्य आयोग का स्वतंत्र ढांचा नहीं है; केरल राज्य आयोग के अध्यक्ष को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में जिला आयोग में 37 और राज्य आयोग में मात्र 4 मामले लंबित हैं।गोवा में राज्य आयोग के समक्ष 39 मामले लंबित हैं, लेकिन अब तक नियमित अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की गई है।इन आंकड़ों के आधार पर अदालत ने संकेत दिया कि कम मामलों वाले राज्यों में स्थायी आयोग की व्यवहारिकता पर पुनर्विचार की आवश्यकता है, ताकि न्याय व्यवस्था प्रभावी और संसाधन-संतुलित रह सके।

अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट के व्यापक निर्देश

सुप्रीम कोर्ट  ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता शिकायतों और वैधानिक अपीलों को निष्प्रभावी नहीं होने दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्याय पाने का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए और किसी भी वादी को व्यवस्था की कमी के कारण असहाय नहीं छोड़ा जा सकता। इसी आधार पर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निम्नलिखित निर्देश जारी किए गए,सभी संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो सप्ताह के भीतर राज्य उपभोक्ता आयोगों के समक्ष लंबित शिकायतें और अपीलें संबंधित क्षेत्राधिकार वाले उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को सौंपने का निर्देश दिया गया।उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से आग्रह किया गया कि वे इन मामलों को एकल न्यायाधीश को सौंपें। यह न्यायाधीश राज्य आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे और तकनीकी सदस्य उनकी सहायता करेंगे। अदालत ने अपेक्षा जताई कि मामलों का निस्तारण संभव हो तो तीन महीने के भीतर किया जाए।यदि इन निर्णयों के विरुद्ध National Consumer Disputes Redressal Commission (NCDRC) में अपील दायर होती है, तो उसके अध्यक्ष से अनुरोध किया गया कि ऐसे मामलों को अपनी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें, क्योंकि मूल आदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा पारित होगा।

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