जैसे ही इज़राइल और ईरान के बीच तनातनी बढ़ी, वैश्विक ऊर्जा बाजार ने तुरंत असर दिखाया। Brent crude की कीमतों में तेज़ हलचल देखी गई और खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले टैंकरों का बीमा प्रीमियम भी ऊपर चला गया। कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया मंचों ने 1973 के तेल संकट की याद दिलानी शुरू कर दी—वह दौर जब प्रतिबंधों ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया था और महंगाई अचानक बढ़ गई थी।दरअसल, यह एक परिचित पैटर्न है। पश्चिम एशिया में हर बार तनाव बढ़ने पर वही आशंका दोहराई जाती है—क्या कच्चे तेल की कीमतें उछलेंगी, क्या महंगाई पर दबाव बढ़ेगा, और क्या नीति-निर्माताओं के लिए हालात संभालना मुश्किल हो जाएगा? यही सवाल एक बार फिर वैश्विक बाजारों और सरकारों के सामने खड़े हैं।हालांकि पिछली घटनाओं से तुलना करना सहज है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वही नतीजा निकलेगा, यह तय नहीं है। असली मुद्दा केवल यह नहीं कि टकराव के समय तेल की कीमतें चढ़ती हैं—ऐसा अक्सर होता है—बल्कि यह है कि क्या ये बढ़ी हुई कीमतें लंबे समय तक टिकती हैं। निर्णायक सवाल यही है कि क्या यह उछाल इतना स्थायी होगा कि मौजूदा महंगाई के रुख को बदल दे और व्यापक आर्थिक स्थिति पर असर डाले।

       पिछले चार दशकों के वार्षिक आंकड़े एक स्पष्ट रुझान दिखाते हैं। बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम शुरू होते ही तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आता है—चाहे वह 1990-91 का गल्फ वार   हो, 2003 का ईराक यद्ध , 2011 का Arab Spring या 2022 में Russian invasion of Ukraine की शुरुआत।उदाहरण के तौर पर, जब इराकी सेना ने कुवैत पर हमला किया, तब Brent crude की कीमतों में तेज़ उछाल देखा गया। हालांकि, यह बढ़ोतरी स्थायी नहीं रही और दो वर्षों के भीतर दाम फिर नीचे आ गए। इसी तरह 2003 के इराक युद्ध के दौरान भी कच्चे तेल की कीमतें चढ़ीं, लेकिन इससे लंबे समय तक आपूर्ति संकट या स्थायी कमी की स्थिति पैदा नहीं हुई।2008 में, जब वैश्विक मांग तेज़ थी और आपूर्ति सीमित, तब Brent crude की औसत कीमत लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। लेकिन उसी साल आए Global Financial Crisis के दौरान मांग कमजोर पड़ी और दाम तेजी से नीचे आ गए। 2011-13 के बीच कीमतें तीन साल तक 100 डॉलर से ऊपर रहीं, जिसकी बड़ी वजह लीबिया में आपूर्ति बाधाएं थीं। यह दौर इसलिए खत्म हुआ क्योंकि वैश्विक आपूर्ति बढ़ी—खासकर अमेरिका में शेल उत्पादन बढ़ने से बाजार का संतुलन बदल गया।

  1973 का परिदृश्य अलग था। उस समय OPEC द्वारा जानबूझकर और लगातार आपूर्ति घटाई गई, जिससे कीमतों में लंबी अवधि तक उछाल रहा और महंगाई की उम्मीदें मजबूत हो गईं। लेकिन 1987 के बाद के आंकड़े यह संकेत नहीं देते कि मध्य पूर्व में हर तनाव से वैश्विक आर्थिक ढांचे में स्थायी बदलाव आता है।फिर भी भारत के लिए अस्थायी उछाल भी अहम है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85–88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है—यानी 4.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक। अधिकांश वर्षों में कच्चा तेल अकेले ही कुल माल आयात बिल का लगभग एक-चौथाई हिस्सा होता है। इनमें से करीब 60 प्रतिशत आपूर्ति पश्चिम एशिया से आती है। साफ है कि खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता केवल वैश्विक चिंता नहीं, बल्कि भारत के बाहरी आर्थिक संतुलन से सीधा जुड़ा मुद्दा है।उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर तेल का सीधा प्रभाव सीमित दिख सकता है, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष असर व्यापक है। परिवहन, उर्वरक, प्लास्टिक, लॉजिस्टिक्स और विमान ईंधन जैसे क्षेत्रों के जरिये लागत बढ़ोतरी पूरी अर्थव्यवस्था में फैलती है, भले ही वह CPI में तुरंत स्पष्ट न दिखे। कच्चे तेल की कीमत में लगातार 10 डॉलर की बढ़ोतरी चालू खाता घाटे को बढ़ा सकती है, बजटीय गणनाओं को जटिल बना सकती है और कई उद्योगों की लागत संरचना पर दबाव डाल सकती है।स्थिति तब और कठिन हो जाती है जब तेल की कीमतों में उछाल डॉलर की मजबूती के साथ जुड़ जाता है।

दोहरा असर

      तेल की कीमत डॉलर में तय होती है। वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर आमतौर पर डॉलर मजबूत होता है। ऐसे में यदि तेल महंगा हो और डॉलर भी मजबूत रहे, तो भारत पर दोहरी मार पड़ती है—अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ती है और रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ता है। नतीजतन, आयात बिल और भी भारी हो जाता है और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।

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