पूर्व सीजेआई ललित ने सामुदायिक सेवा की सजा से जुड़ी अस्पष्टता पर चिंता जताईनयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) यू यू ललित ने बुधवार को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत सामुदायिक सेवा सजा देने के दिशा-निर्देशों में कमी पर चिंता जताई।‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में अधिवक्ताओं के एक समूह को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति ललित ने कहा कि बीएनएस की धारा 356(2) के तहत मानहानि के लिए दो साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों या सामुदायिक सेवा की सजा हो सकती है।उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि इस बारे में कोई दिशानिर्देश नहीं हैं कि सामुदायिक सेवा की सजा कितनी होनी चाहिए। अगर दो साल की जेल की सज़ा है तो क्या इसका मतलब दो साल की सामुदायिक सेवा भी है?’’ उन्होंने यह भी बताया कि सामुदायिक सेवा की सजा के प्रकार के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।उन्होंने पूछा, ‘‘किस तरह की सामुदायिक सेवा? क्या यह आपके गुरुद्वारे में कार सेवा जैसी कोई चीज है? दिन में कितना समय? दो घंटे, चार घंटे, छह घंटे या आठ घंटे? और इसका मापदंड क्या है?’ यह पूरी तरह से न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर है। उन्होंने कहा कि सामुदायिक सेवा की सजा के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए कि यह कितनी हो, कब दी जाए और किस मापदंड पर तय हो। 

जस्टिस यूयू ललित की मुख्य चिंताएँ: 
BNS-2023 में सामुदायिक सेवा दंड के रूप में देने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों का अभाव है।यह प्रावधान पूरी तरह से न्यायाधीश के विवेक पर छोड़ दिया गया है, जिससे निर्णय मनमाने हो सकते हैं।यह तय करने के लिए कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है कि सामुदायिक सेवा कितने घंटों की होगी या किस तरह के अपराध के लिए दी जाएगी।
बीएनएसएस (BNS) में सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में शामिल किया गया है, जहाँ दोषी व्यक्ति को समुदाय को लाभ पहुँचाने वाला काम करना पड़ता है, जिसके लिए उसे कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता है।जस्टिस ललित ने ऐसे स्पष्ट विधायी दिशानिर्देशों की मांग की है ताकि न्यायाधीशों के विवेक पर निर्भरता कम हो और यह दंड अधिक प्रभावी और न्यायसंगत तरीके से लागू हो सके।

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