पिछले 10-12 सालों में भारत की विदेश नीति को लेकर यह दिखाने की कोशिश रही है कि भारत बहुत ताक़तवर बन चुका है, लेकिन बीते एक साल में जो घटनाएं हुईं, उनसे साफ़ हो गया कि भारत की आर्थिक, तकनीकी और सैन्य ताक़त की अपनी सीमाएं हैं,हर पाँच मिनट में ज़ोर-ज़ोर से चार ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का ढिंढोरा पीटना तब ज़्यादा मायने नहीं रखता, जब आपके दरवाज़े पर (चीन) 20 ट्रिलियन डॉलर की एक शत्रुतापूर्ण अर्थव्यवस्था खड़ी हो और सामने 30 ट्रिलियन डॉलर की एक महाशक्ति (अमेरिका) हो, जिसके पास केवल एक सवाल है,हाल में तुमने मेरे लिए क्या किया है? ”व्यक्तिगत रूप से, मुझे नहीं लगता कि इस घमंड को कम किया जा सकता है, यह घरेलू राजनीति के साथ इतनी गहराई से जुड़ चुका है कि इससे पीछे हटना आसान नहीं है, कोई भी यह कहकर चुनाव नहीं जीतने वाला कि, “असल में क्या है, कोई हमें विश्वगुरु नहीं मानता, भारत एक कठिन पड़ोस में स्थित एक मध्यम शक्ति है और कुछ मामलों में वह तीन दशक पहले की तुलना में कम सुरक्षित है,
भारत की चुप्पी का फ़ायदा क्या मिल रहा है? भारत के ख़िलाफ़ अमेरिका ने 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया है, ईरान से व्यापार करने पर अमेरिका 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगाएगा,दुनिया के किसी भी देश को अमेरिका में भारत जितना टैरिफ़ नहीं देना पड़ रहा है, क्या यही रणनीतिक स्वायत्तता है,’हम हर मुद्दे पर चुप हैं, इसके बावजूद भारत अमेरिका का भरोसा नहीं जीत पा रहा है, संभव है कि भारत को लगता हो कि बोलने से ट्रंप के बैडबुक में ना आ जाएं,यानी एक तरह से भारत आशंकित है, अब सरकार को जवाब देते नहीं बन रहा है, जयशंकर ने अपनी एक किताब में लिखा है कि तरह-तरह के जो टकराव होते हैं, उनमें अवसर देखने चाहिए, लेकिन ये सारी रणनीति काम नहीं आई, हमें अपनी विदेश नीति पर फिर से सोचने की ज़रूरत है,भारत के लिए यह कोई नई स्थिति नहीं है,मार्च 2003 में जब अमेरिका और ब्रिटेन ने इराक़ पर हमला किया, तब भारत के सामने भी अमेरिकी दबाव था कि वह सैनिक सहायता दे, उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्पष्ट अनुमति नहीं थी और इस युद्ध को हमला कहा गया था,उस दौर में अमेरिका ने कई देशों से समर्थन मांगा था, कुछ देशों ने सैनिक भेजे, कुछ ने लॉजिस्टिक और अन्य सहायता दी, भारत से भी अपेक्षा की गई थी कि वह सैनिक भेजे लेकिन तत्कालीन अटल विहारी वाजपेयी सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया,भारत का रुख़ यह था कि बिना संयुक्त राष्ट्र के स्पष्ट प्रस्ताव के किसी देश पर हमला मंज़ूर नहीं है,यह फ़ैसला भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और गुटनिरपेक्ष परंपरा के अनुरूप था, इराक़ युद्ध के समय भारत ने सैनिक भेजने से इनकार कर दिया था, बावजूद इसके कि अमेरिका के साथ रिश्ते उस समय बेहतर हो रहे थे, भारत ने यह स्पष्ट किया था कि वह क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा और पुनर्निर्माण का समर्थन करता है, लेकिन सैन्य हस्तक्षेप के ज़रिये नहीं.”ट्रंप का दृष्टिकोण जॉर्ज बुश से भी अधिक आक्रामक और एकतरफ़ा माना जा रहा है, ऐसे में भारत के सामने चुनौती और भी बड़ी है, इतिहास बताता है कि भारत ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया है, सवाल यह है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में क्या भारत वही रुख़ दोहराएगा या किसी नए रास्ते का चयन करेगा,
भारत अभी एक धर्मसंकट की स्थिति में है,ट्रंप ने भारत को ग़ज़ा पर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है,कई देशों ने इसे स्वीकार किया और कई देशों ने नकार दिया,लेकिन भारत अभी तक कोई फ़ैसला नहीं कर पाया है,कहा जा रहा है कि ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ यूएन की सत्ता को चुनौती देता है,इसकी कोई समय सीमा नहीं तय की गई है, बोर्ड ऑफ पीस की स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर का भुगतान करना है, कनाडा ने यह रकम देने से इनकार कर दिया है लेकिन भारत अनिर्णय की स्थिति में है,

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