दीन दयाल उपाध्याय की हत्या और माधवराव सिंधिया के प्लेन क्रैश से लेकर गांधी परिवार की हत्याओं तक, राजनीति में जो कुछ भी होता है, उसका हिसाब-किताब से कम और किस्मत से ज़्यादा लेना-देना होता है,बारामती जा रहे लेयरजेट विमान की क्रैश लैंडिंग में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार और विमान में सवार सभी लोगों की दुखद मौत यह याद दिलाती है कि जीवन कितना नाजुक है और कैसे कुछ ही मिनटों में सब कुछ बदल सकता है,महाराष्ट्र की राजनीति के लिहाज से पवार का निधन भविष्य को लेकर बनी कई आम धारणाओं को उलट देता है, शरद पवार के दो दशक से अधिक पहले कांग्रेस से अलग होने के बाद से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभाती रही है, एनसीपी में विभाजन हुआ, जिसमें उनके भतीजे अजित पवार ने बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन का साथ दिया, और इससे राजनीतिक शक्तियों का पुनर्संतुलन हुआ,हाल के दिनों में परिवार के फिर से एक होने को लेकर अटकलें थीं, जिनमें यह कल्पना की जा रही थी कि एकजुट एनसीपी फिर से उभर सकती है और महाराष्ट्र की राजनीति के समीकरण बदल सकती है,परन्तु अब यह सब सिर्फ अटकलें ही रह जाएंगी,किसी भी राजनीतिक आकलन में ऐसी घटना की कल्पना तक नहीं की गई थी, और आने वाले दशकों तक हम यह सोचते रहेंगे कि किस्मत के एक मोड़ के बिना महाराष्ट्र में चीजें कैसी हो सकती थी
1977 से 1980 की शुरुआत तक के छोटे अंतराल के बाद इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं और संजय एक ऐसी ताकत बन गए, जैसी भारत ने पहले कभी नहीं देखी थी,उनकी मौजूदगी में उनकी मां की पहले से सख्त शैली भी नरम लगने लगी, उनकी नीतियां जरूरी नहीं कि गलत थीं, लेकिन उनका रूखा और तानाशाही तरीका अभूतपूर्व था,वह न केवल अपनी मां के उत्तराधिकारी थे, बल्कि उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली दिखने लगे थे,फिर एक सुबह, एक विमान हादसे ने उनकी जान ले ली, संजय युग उसी तरह खत्म हो गया, जैसे वह शुरू हुआ था,अचानक और खतरनाक तरीके से,इसके बाद के वर्षों में श्रीमती गांधी संजय के लोगों के खिलाफ हो गईं, उनकी विधवा से टकराव हुआ और सत्ता के शिखर पर उनके छोटे लेकिन अहम दौर की यादों को मिटा दिया, इसके बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने भी इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया,मान लीजिए संजय जीवित रहते. अगर उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ होता तो भारत कैसा होता,इसका जवाब तय तौर पर देना मुश्किल है, लेकिन उनके जीवन ने इस बात को लेकर बहुत कम संदेह छोड़ा कि वह भारत के उदार लोकतंत्र और नागरिकों को मिली आज़ादियों के साथ किस तरह का व्यवहार करते.यही ‘क्या होता अगर’ वाले क्षणों की बात है,आप कभी नहीं जानते कि वे कब सामने आ जाएंगे, या कैसे इतिहास लगभग सिक्का उछलने जितनी मामूली घटना से पूरी तरह बदल सकता है|

क्या होता अगर का सवाल भारतीय राजनीति को लंबे समय से परेशान करता रहा है,अगर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो क्या कुछ ही महीनों बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस जीत पाती,उनकी हत्या से एक साल पहले कांग्रेस विधानसभा चुनाव हार चुकी थी, इसलिए हार की संभावना वास्तविक लगती थी, या इससे भी पीछे जाएं,अगर प्रधानमंत्री बनने के दो साल से भी कम समय बाद लाल बहादुर शास्त्री की अचानक दिल का दौरा पड़ने से मौत नहीं हुई होती तो क्या इंदिरा गांधी कभी प्रधानमंत्री बन पातीं, क्या गांधी परिवार का राजनीतिक वंश कभी बनता,राजनीति में जो कुछ होता है, उसका बड़ा हिस्सा गणनाओं से कम और किस्मत से ज्यादा जुड़ा होता है,यह बात खास तौर पर प्रधानमंत्री पद के मामले में सच है,नरसिंह राव खराब स्वास्थ्य के कारण राजनीति से संन्यास ले चुके थे और आंध्र प्रदेश लौटने की तैयारी कर रहे थे, तभी राजीव गांधी की हत्या हो गई,बने राजनीतिक शून्य ने राव के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता खोला,यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी का जनसंघ के शीर्ष तक पहुंचना भी शायद किस्मत के बिना संभव नहीं होता, उस समय जनसंघ के नेता दीन दयाल उपाध्याय थे, जो अपने जीवनकाल में काफी सम्मानित थे, लेकिन आज संघ परिवार के बाहर उन्हें कम ही याद किया जाता है, उपाध्याय ने ‘एकात्म मानववाद’ का सिद्धांत दिया, जो जनसंघ की मुख्य विचारधारा बना,फरवरी 1968 में 51 वर्ष की उम्र में उनकी हत्या हो गई, माना जाता है कि लखनऊ से पटना जा रही ट्रेन में लुटेरों ने उन्हें मार डाला,उपाध्याय से दो साल छोटे वाजपेयी उनके उत्तराधिकारी बने, और इसके बाद सब कुछ बदल गया,