मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच रूसी तेल को लेकर अमेरिका के रुख़ पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि जो देश पहले भारत समेत अन्य देशों पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बना रहा था, वही अब उनसे रूसी तेल खरीदने की अपील कर रहा है।अराग़ची का यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका ने हाल ही में कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी है। इस ढील के तहत भारत जैसे देशों को समुद्र में पहले से लदे रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की सीमित अवधि तक खरीद की अनुमति दी गई है।व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump, वित्त मंत्री Scott Bessent और राष्ट्रीय सुरक्षा टीम की सलाह के बाद लिया गया। उन्होंने कहा कि भारत ने पहले जिम्मेदार रवैया अपनाते हुए प्रतिबंधित रूसी तेल की खरीद बंद कर दी थी।

अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार जारी किए गए नए जनरल लाइसेंस के तहत 11 अप्रैल तक जहाज़ों पर पहले से लदे रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के लेन-देन की अनुमति दी गई है। इस लाइसेंस में कुछ प्रतिबंधित रूसी संस्थाओं द्वारा उत्पादित तेल की सीमित खरीद की भी अनुमति शामिल है।इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अराग़ची ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर लिखा कि अमेरिका कई महीनों तक भारत पर रूस से तेल आयात रोकने का दबाव बनाता रहा, लेकिन ईरान के साथ कुछ हफ्तों के संघर्ष के बाद अब वही देश दुनिया से रूसी तेल खरीदने की अपील कर रहा है। उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि तेल की ऊंची कीमतों के कारण रूस को रोज़ाना भारी राजस्व मिल रहा है।ईरानी विदेश मंत्री ने यूरोपीय देशों की भी आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी रुख़ का समर्थन किया, जबकि उनका उद्देश्य रूस के खिलाफ रणनीतिक लाभ हासिल करना था।दरअसल, अमेरिका लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि रूस अपनी तेल आय से यूक्रेन युद्ध को वित्तीय समर्थन दे रहा है। इसी आधार पर अमेरिकी प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाया था और कुछ मामलों में अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी भी दी थी।

हालांकि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया कि प्रतिबंधों में दी गई यह छूट सीमित समय के लिए है और इसका उद्देश्य केवल समुद्र में फंसे तेल के लेन-देन को पूरा करना है, जिससे वैश्विक बाजार में अस्थायी आपूर्ति संकट को कम किया जा सके।मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आया है और कीमतें लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्र में हवाई हमलों और ऊर्जा ढांचे पर खतरे के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है।खासतौर पर Strait of Hormuz को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है।तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर कई देशों में दिखाई देने लगा है। अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमतें एक महीने में काफी बढ़ी हैं, जबकि यूरोप और एशिया के कई देशों में भी ईंधन महंगा हुआ है।

एशियाई देशों पर इसका असर और अधिक देखा जा रहा है क्योंकि क्षेत्र के अधिकांश देश ऊर्जा के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए Philippines को अपना लगभग 95 प्रतिशत कच्चा तेल मध्य पूर्व से मिलता है, जबकि Thailand ने ईंधन बचाने के लिए सरकारी दफ्तरों में ऊर्जा खपत कम करने के उपाय शुरू किए हैं।भारत में भी तेल और गैस की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ी है। हालांकि Ministry of Petroleum and Natural Gas ने कहा है कि देश में पेट्रोल और डीज़ल की पर्याप्त आपूर्ति है और लोगों को घबराकर ईंधन का भंडारण नहीं करना चाहिए।विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना हुआ है और आने वाले समय में इसका असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

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