क्या है मामला ?
10 सितंबर को मऊ निवासी पेंशनर जगतराम तिवारी पुलिस को एक तहरीर देते हैं, उन्होंने बताया कि उनके खाते में अचानक 45 लाख रुपये आए,तिवारी के मुताबिक ओमप्रकाश पटेल नाम के एक आदमी ने उनसे कहा था कि उसके रिश्तेदारों को प्रॉपर्टी डीलिंग में किसी के बैंक खाते की जरूरत है, तिवारी ने पासबुक दे दी और कुछ दिनों बाद उनके खाते में ट्रेजरी से पैसा आ गया,इस रकम को अगले दिन ही निकाल लिया गया|इसी तरह, खंडेला की कमला देवी के खाते में भी 2023 से 2024 के बीच 31 लाख रुपये आए,यह रकम भी उसी तरह गायब हो गई,जब जांचकर्ताओं ने बैंक रिकॉर्ड खंगाले, तो पता चला कि यह रकम ट्रेजरी से पेंशन मद में जारी की गई थी, वरिष्ठ कोषाधिकारी रमेश सिंह ने तत्काल सभी 95 संदिग्ध खातों को सीज करने के निर्देश दिए,इसी से यह पूरा सिंडिकेट उजागर हुआ, जो वर्षों से ट्रेजरी को चूना लगा रहा था|
करोड़ों के खेल में कैसे सफल हुआ शातिर
कोषागार में हर माह पेंशन भुगतान की प्रक्रिया अत्यंत तकनीकी होती है, इसके लिए “प्रोसेस पैकेज” तैयार किया जाता है, जिसमें पेंशनर का नाम, पीपीओ नंबर, एरियर, डीए और मूल पेंशन राशि दर्ज होती है,इस पैकेज से एक “चेकलिस्ट” निकलती है, जिसे पटल सहायक, सहायक कोषागार अधिकारी और वरिष्ठ कोषाधिकारी को मिलान करना होता है,यही वह बिंदु था जहां घोटाले की शुरुआत हुई,कर्मचारियों ने चेकलिस्ट में एरियर कॉलम में फर्जी एंट्री डालनी शुरू कर दी, यह रकम नॉन-बजटरी फंड से जारी होती थी, यानी ऐसा फंड जिसका उपयोग पेंशन भुगतान में होता है और जिसमें फंड की कभी कमी नहीं रहती, इस “खुले स्रोत” को भ्रष्टाचार का जरिया बनाया गया,कर्मचारियों ने कुछ पेंशनरों की मासिक पेंशन राशि को बढ़ा दिया,यह बढ़ोतरी कभी चेकलिस्ट में पकड़ी नहीं गई,चूंकि हर माह नई एंट्री पिछले माह के आंकड़ों पर आधारित होती थी, इसलिए एक बार बढ़ाई गई राशि “नए नॉर्मल” की तरह दर्ज होती चली गई|इसके अलावा एरियर कॉलम का दुरुपयोग हुआ,जब किसी पेंशनर का जीवित प्रमाणपत्र समय पर जमा नहीं होता, तो उसकी पेंशन रोक दी जाती है. प्रमाणपत्र आने के बाद पिछली पेंशन और मौजूदा माह की पेंशन एक साथ भेजी जाती है. इस प्रक्रिया का फायदा उठाकर कर्मचारियों ने एरियर में फर्जी रकम डालना शुरू किया,बिचौलियों ने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई,वे सेवानिवृत्त शिक्षकों या उनके रिश्तेदारों को भरोसे में लेकर उनके खातों का इस्तेमाल करते थे,रकम ट्रांसफर होती, अगले दिन निकाल ली जाती, और फिर बांट दी जाती, जांच में सामने आया कि कुछ खातों में पांच लाख से लेकर तीन करोड़ रुपये तक भेजे गए, सबसे चौंकाने वाला मामला पेंशनर सुशीला देवी का है, जिनके खाते में एक करोड़ 84 लाख 77 हजार रुपये भेजे गए थे,इस तरह के आठ खाते ऐसे मिले जिनमें पौने दो करोड़ से अधिक की रकम आई थी|
घोटाले का बड़ा नेटवर्क और उसकी भूमिका
घोटाले की जड़ें कोषागार के निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक फैली थीं. मुख्य आरोपी सहायक लेखाकर संदीप कुमार श्रीवास्तव को माना जा रहा है. उनके साथ अशोक कुमार (लेखाकार), विकास सिंह सचान (सहायक कोषाधिकारी) और अवधेश प्रताप सिंह (सेवानिवृत्त सहायक कोषाधिकारी) के नाम एफआईआर में दर्ज किए गए हैं. संदीप की भूमिका सबसे केंद्रीय बताई जा रही है. ऑडिट में यह पाया गया कि उसी के कार्यकाल में सबसे ज्यादा फर्जी भुगतान किए गए. जांच में सामने आया कि उसने अपने नाम पर करोड़ों की संपत्ति बनाई. चित्रकूट की एसडीएम कॉलोनी में तीन करोड़ का आलीशान घर, महंगे कपड़े, ब्रांडेड कारें और रियल एस्टेट में निवेश, सब कुछ उसकी बढ़ती “कमाई” की ओर इशारा करता है,इस घोटाले के जांच से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक इसमें करीब 10 बिचौलियों की भूमिका रही, जिनमें से अधिकतर सेवानिवृत्त शिक्षक थे, वे ही नए पेंशनरों को तैयार करते, खाते जुटाते और पैसे निकालने की जिम्मेदारी निभाते,हर ट्रांजेक्शन में रकम का हिस्सा तय होता, लगभग 30 फीसदी बिचौलियों के पास, बाकी कोषागार कर्मचारियों में बंटता|16 अक्टूबर को वरिष्ठ कोषाधिकारी रमेश सिंह ने कर्वी कोतवाली में एफआईआर दर्ज करवाई,कुल 97 लोगों को नामजद किया गया जिनमें 3 मौजूदा कर्मचारी, एक सेवानिवृत्त अधिकारी और 93 पेंशनर शामिल हैं. चित्रकूट के डीएम शिवशरणप्पा जीएन ने एडीएम न्यायिक राजेश प्रसाद, अपर निदेशक कोषागार विष्णुकांत द्विवेदी और वरिष्ठ कोषाधिकारी रमेश सिंह की तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई है, इस समिति को सभी पेंशन फाइलों, भुगतान वाउचरों और बैंक खातों की लाइन-बाय-लाइन जांच करने का आदेश दिया गया|चित्रकूट के एसपी अरुण कुमार सिंह के मुताबिक, “हमने जांच के लिए सीओ सिटी अरविंद वर्मा की अध्यक्षता में टीम गठित की है, अब तक 22 लाख रुपये की रिकवरी की जा चुकी है. बाकी खातों की फॉरेंसिक जांच चल रही है.”
पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल,
कोषागार विभाग में हुए बहुचर्चित वित्तीय घोटाले के मुख्य आरोपी और लिपिक संदीप श्रीवास्तव की शनिवार को हार्ट अटैक से मौत हो गई। संदीप इस घोटाले का मुख्य आरोपी था और उस पर करोड़ों रुपये के गबन का आरोप था।संदीप श्रीवास्तव की मौत के बाद अब इस घोटाले की निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कई सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने CBI जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इस मामले में सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों को ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है, जबकि बड़े अधिकारियों की संलिप्तता के बिना इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं है। यह घोटाला वर्ष 2018 से ही कोषागार विभाग में चल रहा था, लेकिन बावजूद इसके प्रशासनिक अमला मूक दर्शक बना रहा। अब तक की कार्यवाही में केवल छोटे कर्मचारियों को दोषी ठहराया गया है, जबकि ऊपरी स्तर के अधिकारी अभी तक जांच से बाहर हैं।स्थानीय प्रशासन और वित्त विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। मृतक आरोपी के परिजनों और कुछ विभागीय कर्मचारियों ने आशंका जताई है कि संदीप श्रीवास्तव पर घोटाले का पूरा दोष मढ़ा जा रहा था, और उसे मानसिक दबाव का सामना करना पड़ रहा था। हालांकि पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं, एफआईआर 16 अक्टूबर की देर रात दर्ज की गई, लेकिन न तो इसे यूपी कॉप एप पर अपलोड किया गया और न ही सार्वजनिक किया गया, हिरासत में लिए गए मुख्य आरोपी संदीप और अन्य कर्मचारियों के नामों का कोई औपचारिक रिकॉर्ड पुलिस अभिलेखों में नहीं था, पुलिस हिरासत में ही संदीप श्रीवास्तव की प्रयाग राज मेडिकल कालेज में मौत हो गई है,ऐसा संदीप के परिजनों द्वारा कहा गया है,पुलिस कहती है,कि हृदयगति रुकने से उसकी मृत्यु हुई है|
सिस्टम बेहाल है,
इस घोटाले ने राज्य के ऑडिट सिस्टम की कमजोरियों को भी उजागर किया. 2018 से अब तक अकाउटेंट जनरल (एजी) ऑफिस की टीम सात बार कोषागार का ऑडिट करने आई, लेकिन कभी भी रजिस्टरों की गहराई से जांच नहीं की गई. पटल सहायकों ने रिकॉर्ड नहीं दिए और टीम बिना आपत्ति दर्ज किए लौट गई. जब हाल ही में आई विशेष ऑडिट टीम ने लाइन-बाय-लाइन एंट्री चेक की, तभी यह खुलासा हुआ कि रजिस्टरों में हेराफेरी और सॉफ्टवेयर डाटा में छेड़छाड़ की गई थी. यानी भ्रष्टाचार तकनीक के सहारे छिपाया गया था.हालांकि वित्त विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस पूरे मामले की जड़ “नॉन-बजटरी भुगतान प्रणाली” में है. इस फंड से वे भुगतान होते हैं जो बजट मद से अलग हैं, जैसे एरियर या रुकी पेंशन. इसमें न तो डिजिटल लॉक होता है, न ही एंट्री पर स्वचालित अलर्ट. एक रिटायर्ड कोषाधिकारी के मुताबिक, “नॉन-बजटरी फंड भरोसे पर चलता है. अगर किसी कर्मचारी की नीयत बदल जाए तो वह एंट्री में रकम बढ़ाकर करोड़ों रुपये का भुगतान दिखा सकता है, और तब तक कोई पकड़ नहीं पाता जब तक ऑडिट न हो.” इस मामले के सामने आने के बाद अब शासन ने सभी जिलों के कोषागारों से नॉन-बजटरी भुगतान का डाटा तलब किया है. राज्य में लगभग 75 कोषागार और 35 उप-कोषागार हैं, यानी अगर यही पैटर्न अन्य जिलों में भी मिला तो मामला सैकड़ों करोड़ का हो सकता है|उत्तर प्रदेश का का यह घोटाला 2018 से शुरू हुआ है,इस घोटाले ने बिहार के चाईबासा में हुए चारा घोटाले की यादो को ताज़ा कर दिया है, जहां चाईबासा कोषागार का चारा घोटाला सैन्तीश करोड का था आज चित्रकूट के कोषागार का घोटाला सौ करोड के ऊपर है,सीबीआई ने इस मामले में चाईबासा कोषागार से फर्जी बिल बना कर राशि की निकासी करने का आरोप लगाया है. लालू प्रसाद पर गड़बड़ी की जानकारी होने के बाद भी इस पर रोक नहीं लगाने का आरोप है, जबकि डॉ जगन्नाथ मिश्र पर पशुपालन विभाग के उन अधिकारियों को सेवा विस्तार की सिफ़ारिश करने का आरोप है, जो इस घोटाले में शामिल थे,वहीं तमाम सामाजिक संगठनों व पेंशनधारियों ने चित्रकूट कोषागार घोटाले की जांच सी बी आई से कराने की मांग की है |