23 फरवरी को जारी एनसीईआरटी की कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान पुस्तक में न्यायपालिका के सामने ‘भ्रष्टाचार’ और ‘लंबित मामलों’ को बड़ी चुनौतियां बताया गया। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की इजाजत नहीं दी जाएगी और उचित कदम उठाए जाएंगे।राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक को बाजार से हटा लिया है। शिक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने पुष्टि की कि यह कदम ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक वाले अध्याय पर उठे विवाद के बाद उठाया गया।रिपोर्ट के अनुसार, पुस्तक को मंगलवार से बिक्री से वापस ले लिया गया और दिल्ली स्थित एनसीईआरटी मुख्यालय के काउंटर पर भी यह उपलब्ध नहीं है।इस बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पुस्तक की सामग्री पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी और आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी अदालत में इस मुद्दे को उठाया। उनका कहना था कि स्कूली छात्रों को इस प्रकार की सामग्री पढ़ाया जाना चिंताजनक है।मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत मामले से अवगत है और स्वतः संज्ञान लिया जा चुका है। सुनवाई के दौरान जस्टिस दिपांकर दत्ता बागची ने भी पुस्तक की संरचना पर सवाल उठाए।

               इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 23 फरवरी को जारी एनसीईआरटी की कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ अध्याय के तहत ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर नया खंड जोड़ा गया है। इसमें न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों के रूप में विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार और भारी लंबित मामलों को रेखांकित किया गया है। लंबित मामलों के कारणों में जजों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रिया और कमजोर आधारभूत ढांचे का उल्लेख है।नई किताब में अदालतों में लंबित मामलों के आंकड़े भी दिए गए हैं,सुप्रीम कोर्ट में करीब 81 हजार, उच्च न्यायालयों में लगभग 62 लाख और निचली अदालतों में लगभग 4.7 करोड़ मामले लंबित बताए गए हैं।पुस्तक में न्यायाधीशों की आचार संहिता, आंतरिक जवाबदेही तंत्र और शिकायत प्रणाली (CPGRAMS) का भी जिक्र है। साथ ही यह बताया गया है कि गंभीर आरोपों की स्थिति में संसद महाभियोग की प्रक्रिया के जरिए न्यायाधीश को पद से हटा सकती है।किताब में यह भी कहा गया है कि भ्रष्टाचार की धारणा गरीब और वंचित वर्गों की न्याय तक पहुंच को प्रभावित कर सकती है, इसलिए पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई जरूरी है। इसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के बयान का हवाला भी दिया गया है, जिसमें उन्होंने पारदर्शिता और जवाबदेही को लोकतंत्र के लिए आवश्यक बताया था।

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