यौन  हिंसा का अनुभव साझा करना अपने-आप में बेहद कठिन होता है। यह चुनौती और बढ़ जाती है जब आरोपित व्यक्ति प्रभावशाली और सत्ता-संपन्न पुरुष हो।फिर भी, तमाम जोखिमों और दबावों के बावजूद शक्तिशाली लोगों के विरुद्ध सच बोलना क्यों आवश्यक है, यह समय-समय पर स्पष्ट होता रहा है। कई बार पीड़ित को अपनी बात कहने में लंबा समय लग जाता है—और यह देरी इस बात का प्रमाण नहीं होती कि अपराध हुआ ही नहीं।हमारे देश में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ सच सामने आने में वर्षों लग गए। न्याय की राह अक्सर धीमी होती है, लेकिन इससे घटना की गंभीरता कम नहीं हो जाती।दुर्भाग्य से, आवाज़ उठाने वाली साहसी महिलाओं को इस प्रक्रिया में भारी मानसिक और सामाजिक पीड़ा सहनी पड़ती है। उनकी नीयत, चरित्र और चुप रहने की अवधि पर सवाल खड़े किए जाते हैं, मानो उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया हो।ताक़त कई रूपों में सामने आती है—धन, प्रभाव, राजनीतिक सत्ता या ऊँचा पद। जब ये सारे साधन किसी पुरुष के हाथ में एक साथ हों, तो कभी-कभी उनका दुरुपयोग यौन उत्पीड़न और हिंसा के लिए भी किया जाता है।

                       यौन अपराधी जेफ्री एपस्तीनऔर उसके प्रभावशाली परिचितों का मामला भी इसी तरह के शक्ति-संतुलन की कहानी बयां करता है।इसी कारण बीते समय से उसका  और उसके सहयोगियों का नाम लगातार चर्चा में रहा है। वह कौन था, किन लोगों से उसके संबंध थे, और इस नेटवर्क का स्वरूप क्या था—इन सब पहलुओं पर काफी जानकारी सार्वजनिक हो चुकी है।उसके परिचितों के दायरे में शिक्षक, लेखक, कलाकार, कारोबारी, तकनीकी क्षेत्र के दिग्गज, राजनेता, नौकरशाह और वरिष्ठ अधिकारी जैसे कई प्रभावशाली लोग शामिल बताए जाते हैं। इस मामले की गूँज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैली और इसकी चर्चा भारत तक भी पहुँची।इस पूरे विवाद के बीच यह बात भी बार-बार रेखांकित की गई है कि किसी व्यक्ति का नाम एपस्टीन से जुड़ी फाइलों में होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि वह यौन शोषण या उत्पीड़न का दोषी है। यह भी सच है कि किसी को ‘यौन शोषक’ या ‘उत्पीड़क’ कहे जाने मात्र से वह तब तक कानूनी रूप से अपराधी नहीं माना जाता, जब तक अदालत उसे दोषी न ठहराए।इस मामले की शुरुआत लगभग दो दशक पहले, वर्ष 2005 में हुई, जब 14 वर्ष की एक किशोरी के माता-पिता ने आरोप लगाया कि जेफ्री एपस्तीन ने अपने घर पर उनकी बेटी के साथ यौन उत्पीड़न किया। बाद में जब उसके आवास की तलाशी ली गई, तो वहाँ कई अन्य नाबालिग लड़कियों से जुड़ी तस्वीरें और संदिग्ध सामग्री भी बरामद हुईं, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई।लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद वर्ष 2008 में जेफ्री एपस्तीन को यौन अपराध के आरोप में दोषी ठहराया गया और उसे 18 महीने की सज़ा सुनाई गई। हालांकि, सज़ा के दौरान उसे प्रतिदिन कुछ घंटों के लिए जेल से बाहर जाकर काम करने की विशेष अनुमति भी मिली। लगभग 13 महीने तक सज़ा भुगतने के बाद उसे रिहा कर दिया गया।सज़ा के साथ ही उसका नाम न्यूयार्क  के यौन अपराधियों के आधिकारिक रजिस्टर में स्थायी रूप से दर्ज कर लिया गया। इस सूची में शामिल व्यक्तियों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और उनके आवागमन तथा गतिविधियों पर कई तरह की कानूनी पाबंदियाँ लागू होती हैं।लेकिन इस सज़ा से पहले उसके वकीलों ने सरकारी पक्ष के साथ एक समझौता किया, जिसने पूरे मामले की जाँच की सीमा को काफी हद तक सीमित कर दिया। इस समझौते के कारण यह गहराई से जाँच नहीं हो सकी कि क्या अन्य लड़कियाँ भी इस अपराध की शिकार थीं, या इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे।इतना ही नहीं, इस समझौते की जानकारी उन पीड़ितों और उनके परिवारों से भी साझा नहीं की गई, जिन्होंने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई थी। परिणामस्वरूप, उस समय इस मामले के व्यापक दायरे और संभावित सहयोगियों की पूरी सच्चाई सामने नहीं आ सकी।

                       आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल प्रभावशाली लोग किस तरह अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं, जेफरी एपेस्तीन का मामला इसका एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि पूरा तंत्र ही ताक़तवर आरोपितों को जवाबदेही से बचाने में उनकी ढाल बन जाता है।भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ यौन उत्पीड़न के आरोपों में घिरे प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ़ कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं। एपस्टीन प्रकरण में भी यह आरोप बार-बार सामने आए कि उसके साथ जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका की पूरी तरह जाँच नहीं हो सकी।इस मामले ने नया मोड़ तब लिया, जब जुली के ब्राउन  और मियामी हेराल्ड की उनकी टीम ने इसकी गहन पड़ताल शुरू की। उनकी खोजी रिपोर्टों ने उस संगठित तंत्र की ओर ध्यान आकर्षित किया, जिसमें अनेक लड़कियों और महिलाओं के यौन शोषण के आरोप सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने लगभग 80 संभावित पीड़िताओं की पहचान की, जिनमें से कई तक वे पहुँचीं। हालांकि, उनमें से बहुत कम महिलाएँ सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान उजागर कर अपनी कहानी बताने को तैयार हुईं—जो यह दर्शाता है कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ़ बोलना कितना कठिन और जोखिम भरा हो सकता है।इन खुलासों के बाद वर्ष 2019 में जेफरी एपेस्तीन  को दोबारा गिरफ़्तार किया गया। लेकिन गिरफ़्तारी के कुछ ही समय बाद वह अपनी जेल की कोठरी में मृत पाए गए। उनकी मृत्यु ने कई नए सवाल खड़े किए और इसकी परिस्थितियों को लेकर आज भी बहस और जाँच की माँग होती रही है।यदि इस पूरे घटनाक्रम को देखा जाए, तो वर्ष 2005, 2008 और 2019 इस मामले के तीन महत्वपूर्ण चरण रहे—पहले आरोप, फिर दोषसिद्धि और बाद में नए आरोपों के साथ पुनः गिरफ़्तारी। यह सब उस संयुक्त राज्य अमेरिका  में हुआ, जो स्वयं को आधुनिक और न्यायप्रिय लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है।दरअसल, किसी भी समाज की वास्तविक प्रगतिशीलता का आकलन इस बात से होता है कि वह अपने वंचित वर्गों—विशेषकर महिलाओं—के अधिकारों, सम्मान और न्याय को किस गंभीरता से सुनिश्चित करता है। जेफर एपस्तीन और उसके  प्रभावशाली सहयोगियों का मामला उस सामाजिक संरचना को उजागर करता है, जहाँ महिलाओं को अक्सर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के बजाय मात्र उपभोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है।

                                           यह समस्या किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में अलग-अलग रूपों में मौजूद रही है।जब सत्ता, पद, धन और सामाजिक प्रभाव जैसी ताक़तें कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित हो जाती हैं, तो उनका दुरुपयोग कर महिलाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिशें भी सामने आती हैं। इस सोच में महिला को एक स्वायत्त इंसान के बजाय एक ऐसी देह के रूप में देखा जाता है, जिस पर पुरुष का अधिकार माना जाता है।इस तरह के यौन शोषण और हिंसा की जड़ में गहरी असमानता और श्रेष्ठता की मानसिकता होती है—एक ऐसी धारणा, जिसमें पुरुष को स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ और महिला को अधीनस्थ माना जाता है। यह दृष्टिकोण महिलाओं की स्वतंत्रता, गरिमा और समानता के अधिकार को कमजोर करता है।इस मामले से जुड़े दस्तावेज़ों और गवाहियों में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क में कुछ महिलाएँ भी ऐसी भूमिकाओं में थीं, जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस व्यवस्था को बनाए रखने में योगदान दिया। कुछ पीड़िताओं के अनुसार, उन्हें चुप रहने, आदेशों का पालन करने और विरोध न करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता था। उनके लिए यह अनुभव और भी पीड़ादायक था कि इस प्रक्रिया में कुछ महिलाएँ भी इस तंत्र का हिस्सा बनी हुई थीं।यह स्थिति पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जटिलता को दर्शाती है, जहाँ सामाजिक संरचनाएँ और मान्यताएँ इतनी गहराई से जड़ जमा लेती हैं कि कभी-कभी महिलाएँ भी अनजाने में उसी व्यवस्था का समर्थन करने लगती हैं, जो उनके अधिकारों और स्वतंत्रता को सीमित करती है।

                                                      एपस्‍टीन की ऐसी ही एक महत्‍वपूर्ण सहयोगी गिलेन मैक्सवेल को साल 2021 में नाबालिग लड़कियों को फुसलाने और उनका यौन शोषण कराने में सहयोग के इल्‍ज़ाम में मुजर‍िम ठहराया गया.लड़क‍ियों के ल‍िए मर्दाना ताक़त का कुचक्र अँधेरे कुएँ की तरह है. उन्‍हें फँसाया जाता है. वे फ‍िर मानो क‍िसी दलदल में फँसती चली जाती हैं. इनके ल‍िए बोलना, आसान नहीं होता.उनके साथ जुर्म हुआ है और उन्‍हें ही शर्मिंदगी का अहसास कराया जाता है. जुर्म उनके साथ होता है और यह समाज सज़ा भी उन्‍हें ही देता है. तभी तो एपस्‍टीन के मामले में भी शुरुआत में चंद बहादुर लड़क‍ियाँ ही बोलने की ह‍िम्‍मत जुटा पाईं.यही नहीं, एपस्‍टीन फ़ाइल और भी कुछ बताती है. जहाँ तक स्‍त्रि‍यों के साथ सुलूक का सवाल है, प्रगत‍िशील माने जाने वाले मर्दों पर भी यक़ीन करना मुश्‍क‍िल है.एपस्‍टीन दु‍न‍िया के बेहतरीन द‍िमाग़ से मदद माँग रहा था और वे उसे इस बात की सलाह दे रहे थे क‍ि मीड‍िया में उसके यौन अपराधों के बारे में छप रही ख़बरों से कैसे न‍िपटा जाए. ऐसे लोगों के शाम‍िल होने ने अनेक लोगों का भरोसा तोड़ा है. कई ग़ुस्‍से और सदमे में हैं.यानी, दुनिया की सत्ता-संरचना अब भी बड़े पैमाने पर मर्दाना है. दबंग मर्दानगी का दबदबा है. ज़हरीली मर्दानगी का बोझ समाज पर बहुत ज़्यादा है. आज भी स्‍त्री की गर‍िमा वाला समाज बनना बाक़ी है.लेक‍िन ढेरों स्‍त्रि‍याँ ख़ामोश रहने को राज़ी नहीं हैं. वे यह सब बदलना चाहती हैं. इनमें जेफ़री एप्‍सटीन और उसके दोस्‍ताना समूह के यौन उत्‍पीड़न, शोषण और ह‍िंसा सहने वाली अनेक लड़क‍ियाँ शाम‍िल हैं.इन स्‍त्रि‍यों में एक ल‍िज़ा फ़‍िल‍िप्‍स कहती हैं, “हम चाहते हैं क‍ि पूरी फ़ाइल और (एप्‍सटीन के सभी कथ‍ित सहयोग‍ियों के) नाम उजागर क‍िए जाएँ. मेरे ल‍िए, इंसाफ़ का मतलब है यौन तस्‍करी के जाल का पर्दाफ़ाश करना ताकि आगे वे क‍िसी को नुक़सान न पहुँचा सकें.”ये सब बहादुर स्‍त्रि‍याँ अब अपनी आवाज़, नाम, चेहरा भी छ‍िपाने को तैयार नहीं हैं. वे बरसों की यौन ह‍िंसा की यातना के ख़‍िलाफ़ ख़ामोशी तोड़ रही हैं. आवाज़ बुलंद कर रही हैं. अमेर‍िकी संसद के चौखट पर दस्‍तक दे रही हैं.वे माँग कर रही हैं क‍ि जवाबदेही तय की जाए. ताक़तवर लोगों को बचाया न जाए.

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