बॉलीवुड से राजनीति तक का सफर तय कर चुके कमल हासन ने बुधवार को राज्यसभा में ऐसा मुद्दा उठाया, जिसने चुनावी व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बोलते हुए हासन ने मतदाता सत्यापन की SIR प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए और इसे लोकतंत्र के मूल अधिकारों से जोड़ दिया।कमल हासन का कहना था कि देश में चुनाव सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा विषय है। उन्होंने चेताया कि जब वोट देने के अधिकार को ही संदेह के घेरे में डाला जाएगा, तो इसका असर आम लोगों के भरोसे पर पड़ेगा।
‘मतदान अधिकार की ही हो रही है जांच’
अपने भाषण में हासन ने कहा कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया के चलते आम मतदाताओं को बार-बार खुद को साबित करना पड़ रहा है। नाम की वर्तनी, पते या दस्तावेज़ों में मामूली गलती के कारण लोगों को जांच से गुजरना पड़ रहा है, जिससे उनका मतदान अधिकार प्रभावित हो सकता है।उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नागरिक वोट डालना चाहते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा महसूस कराया जा रहा है जैसे उनका अधिकार संदिग्ध हो।राज्यसभा में मक्कल निधि मय्यम के संस्थापक कमल हासन ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि आयोग अनजाने में ही सही, लेकिन बिहार में सामने आई गड़बड़ियों को आगे बढ़ने का मौक़ा दे रहा है।हासन ने एसआईआर प्रक्रिया की तुलना “जीवित लोगों को मृत मानने वाली काग़ज़ी भूलों” से करते हुए कहा कि मामूली तकनीकी या दस्तावेज़ी त्रुटियों को अयोग्यता मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ख़तरनाक है।उनका कहना था कि यदि यही तरीका अन्य राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु में अपनाया गया, तो लाखों लोग सिर्फ़ रिकॉर्ड्स में मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। उन्होंने यह भी मांग की कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उन्हें दोबारा सूची में शामिल किया जाए।
लोकतंत्र केवल जीत का खेल नहीं
अपने भाषण में कमल हासन ने लोकतंत्र की व्यापक परिभाषा पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में स्थायी जीत या स्थायी सत्ता की कोई अवधारणा नहीं होती। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा सबसे ज़रूरी है।उन्होंने चेताया कि मतभेदों को दबाया जा सकता है, लेकिन आम नागरिकों के अधिकारों को कुचलना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट पहुँचा मामला
इसी बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया। उन्होंने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का हवाला देते हुए व्यक्तिगत रूप से याचिका दायर की और आरोप लगाया कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के ज़रिये लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान कर रहा है।रिपोर्ट्स के अनुसार, ममता बनर्जी ने अदालत में यह दलील दी कि बंगाली नामों के अंग्रेज़ी अनुवाद में मामूली अंतर के कारण मतदाताओं को सूची से बाहर किया जा रहा है। उन्होंने शादी के बाद निवास स्थान बदलने वाली महिलाओं और प्रवासी परिवारों के उदाहरण भी रखे।
“इतनी जल्दबाज़ी क्यों?”
मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि जिस पुनरीक्षण प्रक्रिया को आमतौर पर लंबे समय में पूरा किया जाता है, उसे कुछ ही महीनों में निपटाने की जल्दी क्यों दिखाई गई। उनका आरोप था कि चुनाव से ठीक पहले केवल उनके राज्य को निशाना बनाया गया।सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और अधिकारियों को यह सलाह दी कि नामों की वर्तनी जैसी छोटी विसंगतियों को गंभीरता से लेते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए। अदालत ने एसआईआर की संवैधानिक वैधता से जुड़े मामलों पर फैसला सुरक्षित होने की बात भी दोहराई।
