ईरान और अमेरिका के संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। ईरान के तेल संसाधनों को लेकर पश्चिमी देशों की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।सार्वजनिक हुए सीआईए दस्तावेज़ों के अनुसार, ईरान के राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री की सत्ता बदलने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने जनरल फ़ज़लुल्लाह ज़ाहिदी तथा सेना को आर्थिक समर्थन दिया था। उस समय देश में कम्युनिस्ट पार्टी भी प्रभावशाली थी और वह निर्वाचित प्रधानमंत्री के साथ खड़ी थी।

         अमेरिका-इज़रायल द्वारा ईरान पर हमलों के बीच असग़र वजाहत की किताब चलते तो अच्छा था का एक अंश नए सिरे से चर्चा में है। यह लेख ईरान-अमेरिका टकराव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को विस्तार से समझाता है।1953 के तख्तापलट, 1979 की इस्लामी क्रांति और अमेरिकी दूतावास बंधक संकट जैसी घटनाओं के ज़रिए इसमें बताया गया है कि दोनों देशों के बीच तनाव अचानक नहीं उभरा। मौजूदा भू-राजनीतिक हालात को समझने के लिए यह संदर्भ महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  वर्तमान समय में ईरान एक मित्रविहीन देश है  

 ईरान के लिए उसका प्रमुख विरोधी कौन है, यह काफी हद तक स्पष्ट माना जाता है, लेकिन स्थायी मित्र कौन होगा, यह प्रश्न अब भी खुला है। एक इस्लामी गणराज्य होने के बावजूद ईरान के सऊदी अरब से संबंध सहज नहीं रहे। इसका बड़ा कारण शिया-सुन्नी विभाजन है, जिसने इतिहास में दोनों समुदायों के बीच गहरी दूरी बनाई।दूसरा पहलू अरब-ईरानी ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा है। माना जाता है कि अरब विजय के बाद ईरानी सत्ता का अंत हुआ, जिसकी स्मृति आज भी राजनीतिक सोच को प्रभावित करती है। सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना भी दोनों देशों के रिश्तों में तनाव का कारण मानी जाती है। वर्तमान राजनीति में सऊदी अरब अमेरिका का सहयोगी है, जबकि ईरान उसके विरोधी खेमे में देखा जाता है।पड़ोसी देशों में आज़रबाईजान को छोड़ अधिकांश स्थानों पर शिया आबादी सीमित है। मध्य एशिया के कई देश पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे, जहां धर्म की भूमिका अपेक्षाकृत कम प्रभावी रही। आज़रबाईजान में शिया बहुलता है, लेकिन वहां की धार्मिक और सामाजिक संरचना ईरान से अलग मानी जाती है।

          ईरान के बाहर बड़ी शिया आबादी वाला प्रमुख देश इराक है। विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान-इराक युद्ध की पृष्ठभूमि में सांप्रदायिक समीकरण भी एक कारक थे। इराक के कई शिया समूहों को ईरान समर्थक माना जाता है, लेकिन वहां सुन्नी समुदाय और जटिल राजनीतिक संतुलन के कारण बगदाद खुलकर तेहरान के साथ खड़ा होने से अक्सर सावधानी बरतता है।क्षेत्रीय स्तर पर पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के साथ भी ईरान के संबंध संतुलन की राजनीति से प्रभावित रहे हैं, जिससे उसके स्थायी सहयोगियों की सूची सीमित दिखती है।1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्ज़ा कर 90 अमेरिकी राजनयिकों को बंधक बना लिया गया था। इस घटना को Iran hostage crisis के नाम से जाना जाता है। दो सप्ताह बाद 13 महिलाओं को रिहा किया गया था। उस समय आंदोलन को रुहोल्लाह खुमैनी का समर्थन प्राप्त था, और प्रमुख मांगों में अमेरिका में शरण लिए शाह को ईरान लौटाने की मांग शामिल थी।

1979 में अमेरिकी दूतावास से बंधकों को छुड़ाने के एक असफल अभियान में आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। इसके बाद दोनों देशों के राजनयिक संबंध टूट गए। अंततः 444 दिन बाद ईरान ने 52 अमेरिकी बंधकों को रिहा किया। तब से अब तक ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच औपचारिक कूटनीतिक रिश्ते बहाल नहीं हो सके हैं।विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव केवल 1979 की घटना तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें 1953 के तख्तापलट में हैं। उस समय Central Intelligence Agency (सीआईए) की भूमिका से जुड़े दस्तावेज़ों में संकेत मिलता है कि ईरान के निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक की सरकार गिराने में अमेरिका और ब्रिटेन ने जनरल फ़ज़लुल्लाह ज़ाहिदी का समर्थन किया। इसके बाद शाह की सत्ता मजबूत हुई और पश्चिमी प्रभाव बढ़ा।इतिहासकारों के अनुसार, तख्तापलट के बाद दमन, गिरफ्तारियों और राजनीतिक उथल-पुथल का दौर चला। तेल संसाधनों पर पश्चिमी कंपनियों का प्रभाव बढ़ा और ईरान को बड़े पैमाने पर हथियारों की बिक्री भी हुई। इन घटनाओं ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को गहरा किया, जिसका असर आज तक दिखाई देता है।

       1976 में एमनेस्टी इन्टरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में शाह शासन के दौरान ईरान की मानवाधिकार स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि मृत्युदंड की उच्च दर, निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया की कमी और यातनाओं के आरोप चिंताजनक थे। उस दौर में शाह की खुफिया एजेंसी सवाक को सीआईए से प्रशिक्षण और सहयोग मिलने की बात भी विभिन्न स्रोतों में दर्ज है।विश्लेषकों के अनुसार, यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ईरान और अमेरिका के बीच गहरे अविश्वास को समझने में अहम है। राजनीतिक स्तर पर ईरान लंबे समय से अमेरिका को अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है, जबकि पश्चिमी देशों के साथ उसके संबंध भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाते हैं।दिलचस्प यह है कि राजनीतिक विरोध के बावजूद ईरान में अमेरिकी संस्कृति का प्रभाव, खासकर युवाओं के बीच, दिखाई देता है। फैशन, फिल्मों और जीवनशैली के कुछ पहलू लोकप्रिय हैं। कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह रुझान सामाजिक बदलाव या व्यवस्था के प्रति असहमति की अभिव्यक्ति भी हो सकता है।हालांकि, संकट के समय ईरान में राष्ट्रीय एकता की बात कही जाती है, लेकिन 1953 के तख्तापलट और उसके बाद के घटनाक्रम इस धारणा पर बहस को जन्म देते रहे हैं।

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