चीन और ईरान के बीच मजबूत रणनीतिक रिश्ते हैं, लेकिन परमाणु हथियारों के मुद्दे पर बीजिंग का रुख अलग दिखाई देता है। चीन साफ तौर पर कह चुका है कि वह ईरान को परमाणु हथियार संपन्न देश बनते नहीं देखना चाहता।वर्ष 2015 में हुए Joint Comprehensive Plan of Action (जेसीपीओए) से पहले चीन ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का समर्थन किया था। इससे यह संकेत मिलता है कि बीजिंग परमाणु प्रसार के मुद्दे पर सख्त नीति अपनाता है।चीन को आशंका है कि यदि ईरान परमाणु हथियार विकसित करता है, तो मध्य-पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है और व्यापक युद्ध की स्थिति बन सकती है। ऐसी परिस्थिति में खाड़ी क्षेत्र के अहम समुद्री मार्ग बाधित हो सकते हैं, जिससे चीन के तेल आयात और आर्थिक हित प्रभावित होंगे।इसके अलावा, ईरान के परमाणु शक्ति बनने से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी हथियारों की प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है। जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अपनी सुरक्षा रणनीति में बदलाव कर सकते हैं, जो चीन के लिए नई चुनौतियां खड़ी करेगा।हालांकि, चीन यह मानता है कि परमाणु अप्रसार संधि के तहत ईरान को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के उपयोग का अधिकार है, लेकिन वह इस कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी और पारदर्शिता के दायरे में रखने पर जोर देता है।

ईरान पर चीन का रुख: सिद्धांत बनाम सक्रिय भूमिका

ईरान के मुद्दे पर चीन का दृष्टिकोण औपचारिक रूप से सिद्धांतों पर आधारित नजर आता है। बीजिंग लगातार संवाद, राष्ट्रीय संप्रभुता के सम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता की बात करता है। उसका जोर यह रहता है कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए निकाला जाए।लेकिन सवाल उठता है कि क्या केवल सिद्धांतों की पुनरावृत्ति से जटिल क्षेत्रीय संकट हल हो सकते हैं?पिछले तीन दशकों से अधिक समय से चीन खुद को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक बताता रहा है। वह मौजूदा वैश्विक ढांचे में बदलाव और अधिक संतुलित शक्ति-संतुलन की वकालत करता है। हालांकि, जब वास्तविक और पेचीदा संकट सामने आते हैं—जैसे ईरान का परमाणु विवाद या पश्चिम एशिया की अस्थिरता—तो चीन की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है।ईरान का मामला इसी विरोधाभास को सामने लाता है। एक ओर वहां चीन के बड़े आर्थिक हित हैं—ऊर्जा, व्यापार और निवेश के रूप में—लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक या सामरिक स्तर पर उसका हस्तक्षेप सावधानीपूर्ण और नियंत्रित रहता है। इससे यह धारणा बनती है कि बीजिंग अपने सिद्धांतों और व्यावहारिक हितों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

     अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से दबाव झेल रही ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए चीन एक अहम भागीदार बना हुआ है। वर्ष 2025 में ईरान के निर्यातित तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन रहा। हालांकि यह संबंध एकतरफा नहीं है—चीन को रियायती दरों पर ऊर्जा आपूर्ति मिलती है, जिससे उसे भी आर्थिक लाभ होता है।चीन ने केवल व्यापार तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उसने ईरान को वैश्विक मंचों पर अलग-थलग पड़ने से बचाने की कोशिश भी की। बीजिंग ने ईरान की BRICS और Shanghai Cooperation Organisation (एससीओ) में सदस्यता के समर्थन में भूमिका निभाई, जिससे तेहरान को एक वैकल्पिक कूटनीतिक मंच मिला।दोनों देशों के बीच वर्ष 2021 में 25 साल की दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी समझौता भी हुआ, जिसने ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा सहयोग को नई दिशा दी। विश्लेषकों के अनुसार, चीन ने ईरान को बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम से जुड़े कुछ पुर्जों और तकनीकी सहायता भी प्रदान की है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय हथियार प्रसार रोधी प्रतिबंधों में परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधियां भी शामिल होती हैं, इसलिए यह पहलू संवेदनशील माना जाता है।इन सबके बावजूद, जब ईरान क्षेत्रीय तनाव और प्रत्यक्ष सैन्य दबाव का सामना करता है, तब चीन की भूमिका सावधानीपूर्ण दिखाई देती है। वह आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग जारी रखता है, लेकिन किसी खुले सैन्य समर्थन या सीधे टकराव से दूरी बनाए रखने की रणनीति अपनाता है। इससे संकेत मिलता है कि बीजिंग अपने हितों की रक्षा करते हुए जोखिम को सीमित रखना चाहता है।

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