इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से निर्धारित होती है और धर्म परिवर्तन करने से उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला के अंतरजातीय विवाह करने मात्र से उसकी जन्मजात जाति समाप्त या परिवर्तित नहीं मानी जा सकती।यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जस्टिस अनिल कुमार-X की पीठ ने दिनेश और आठ अन्य आरोपियों द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए की। आरोपियों ने अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश (SC/ST Act) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (मारपीट), 506 (आपराधिक धमकी), 452 (घर में अनाधिकृत प्रवेश) और 354 (महिला की गरिमा भंग करने का प्रयास) के साथ-साथ SC/ST Act की धारा 3(1)(R) के तहत आरोपों का सामना करने के लिए अदालत में तलब किया गया था।हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि निचली अदालत द्वारा पारित समन आदेश विधिसम्मत है और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि धर्म परिवर्तन या विवाह जैसे व्यक्तिगत निर्णय किसी व्यक्ति की जन्म से जुड़ी जातिगत पहचान को समाप्त नहीं करते। इसलिए, संबंधित प्रावधानों के तहत आरोपियों के खिलाफ ट्रायल जारी रहना न्यायोचित है।सूचना देने वाली महिला ने अपील करने वालों के खिलाफ क्रिमिनल शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसके साथ मारपीट की गई, उसे गाली दी गई और अपील करने वालों ने झगड़े के दौरान उसके खिलाफ जातिसूचक गालियां दीं। उसने यह भी आरोप लगाया कि इस घटना में उसके समेत 3 लोग घायल हो गए। समन ऑर्डर को चुनौती देते हुए अपील करने वालों ने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि हालांकि सूचना देने वाली महिला जन्म से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) समुदाय से थी और मूल रूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली है, लेकिन जाट समुदाय के एक आदमी से शादी करने के बाद उसने अपनी जाति का दर्जा खो दिया।अपीलकर्ताओं की ओर से यह दलील दी गई कि किसी महिला की शादी यदि दूसरी जाति के व्यक्ति से हो जाती है, तो वह अपनी जन्मजात जाति की पहचान खो देती है और विवाह के बाद उसे अपने पति की जाति का सदस्य माना जाना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने तर्क रखा कि इस मामले में SC/ST Act के तहत लगाए गए आरोपों के लिए उन्हें समन जारी करना विधिसम्मत नहीं है और यह आदेश टिक नहीं सकता।इसके अतिरिक्त, अपीलकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि शिकायतकर्ता महिला ने उन्हें झूठे मामले में फंसाया है। उनका कहना था कि इस घटना से पहले उन्होंने स्वयं महिला और उसके परिजनों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी, और उसी का प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से उनके खिलाफ यह शिकायत दर्ज कराई गई।अपीलकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह तर्क रखा कि यदि कोई महिला दूसरी जाति के व्यक्ति से विवाह करती है, तो विवाह के बाद उसकी पहचान उसके पति की जाति से जुड़ जाती है और उसकी जन्म से प्राप्त जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता को SC/ST समुदाय का सदस्य मानते हुए उनके खिलाफ SC/ST Act के तहत समन जारी करना कानूनी रूप से उचित नहीं है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

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