इच्छामृत्यु (Euthanasia) को लेकर देश में एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हरीश राणा से जुड़े मामले के सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि आखिर इच्छामृत्यु क्या होती है, इसकी प्रक्रिया क्या है और ऐसे मामलों में निर्णय आने में कितना समय लग सकता है।दरअसल, इच्छामृत्यु वह स्थिति है जब कोई असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति असहनीय पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए अपनी जीवनलीला समाप्त करने की अनुमति मांगता है। भारत में यह विषय कानूनी और नैतिक दोनों दृष्टियों से बेहद संवेदनशील माना जाता है।भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) अवैध है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी गई है। इसमें मरीज को दी जा रही जीवनरक्षक चिकित्सा—जैसे वेंटिलेटर या अन्य उपकरण—को हटाने की अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए।इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों में आमतौर पर मरीज या उसके परिजनों की ओर से अदालत या अस्पताल प्रशासन के सामने आवेदन किया जाता है। इसके बाद मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाता है, जो मरीज की स्थिति का विस्तृत परीक्षण करता है। यदि बोर्ड यह मानता है कि मरीज की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है और वह असहनीय पीड़ा में है, तो वह अपनी रिपोर्ट संबंधित प्राधिकरण को सौंपता है।सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, ऐसे मामलों में दो मेडिकल बोर्डों की राय ली जाती है। इसके अलावा, मजिस्ट्रेट के सामने मरीज की इच्छा की पुष्टि भी जरूरी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में कई स्तर की जांच और औपचारिकताएं शामिल होती हैं, जिसके कारण फैसला आने में कई दिन या कभी-कभी कई सप्ताह भी लग सकते हैं।
हरीश राणा के मामले में भी अब यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। मेडिकल विशेषज्ञों की राय, कानूनी औपचारिकताएं और प्रशासनिक अनुमति के बाद ही आगे का निर्णय लिया जाएगा।विशेषज्ञों का मानना है कि इच्छामृत्यु जैसे मामलों में जल्दबाजी के बजाय पूरी सावधानी और पारदर्शिता जरूरी होती है, ताकि मरीज की गरिमा और कानून दोनों का सम्मान बना रहे। यही वजह है कि ऐसे मामलों में निर्णय की प्रक्रिया अपेक्षाकृत लंबी और बहुस्तरीय होती है।हरीश राणा का मामला आने वाले दिनों में इच्छामृत्यु को लेकर देश में चल रही बहस को और तेज कर सकता है। वहीं यह भी देखने वाली बात होगी कि कानूनी प्रक्रिया के बाद इस मामले में क्या निर्णय सामने आता है।
हरीश राणा मामले में कैसे अपनाई जा रही है प्रक्रिया?
हरीश राणा के मामले में जीवन रक्षक प्रणालियों को हटाने के लिए भारत का पहला विशेष मेडिकल प्रोटोकॉल लागू किया जा रहा है।
विशेषज्ञ मेडिकल टीम का गठन:
इस प्रक्रिया के संचालन के लिए एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर डॉ. सीमा मिश्र के नेतृत्व में एक विशेष टीम बनाई गई है। इस टीम में न्यूरोसर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया, पैलिएटिव केयर और मनोरोग विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हैं।
उपचार को धीरे-धीरे हटाना:
विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रक्रिया में अचानक जीवन रक्षक उपकरण बंद नहीं किए जाते। कृत्रिम पोषण, ऑक्सीजन और अन्य दवाओं को चरणबद्ध तरीके से कम किया जाता है।
दर्द से राहत सुनिश्चित करना:
मरीज को किसी प्रकार का दर्द, घबराहट या शारीरिक तकलीफ न हो, इसके लिए दर्द निवारक दवाएं और ‘पैलिएटिव सिडेशन’ दिया जाता है। डॉक्टरों का उद्देश्य मृत्यु को जल्द लाना नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण और प्राकृतिक मृत्यु सुनिश्चित करना होता है।
कितना समय लग सकता है:
समाचार एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक, जीवन रक्षक प्रणालियों को पूरी तरह हटाने और पूरी प्रक्रिया के पूरा होने में दो से तीन सप्ताह तक का समय लग सकता है।
दुनियाभर में इच्छामृत्यु का इतिहास
इच्छामृत्यु की अवधारणा बेहद पुरानी है और विभिन्न सभ्यताओं में इसे अलग-अलग तरीके से देखा गया है।
प्राचीन काल:
लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व रचित Iliad में घायल योद्धाओं द्वारा असहनीय पीड़ा से मुक्ति की इच्छा का उल्लेख मिलता है।
भारत के प्राचीन ग्रंथों में तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश यानी व्रत के माध्यम से प्राण त्यागने की परंपरा का उल्लेख भी मिलता है।
यूनानी दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक The Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु के विचार का समर्थन किया था। हालांकि, चिकित्सा जगत में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने डॉक्टरों को मरीज को जानबूझकर घातक दवा देने से रोक दिया।
रोमन साम्राज्य में दार्शनिक Seneca ने असाध्य रोगियों के लिए तार्किक आत्महत्या का समर्थन किया था, जबकि चिकित्सक Galen उपचार रोकने जैसे तरीकों की चर्चा करते थे।
मध्यकाल:
ईसाई धर्म के प्रभाव के बाद इच्छामृत्यु को लगभग पूरी तरह वर्जित कर दिया गया। धर्मशास्त्रियों Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया।
आधुनिक काल:
19वीं सदी में चिकित्सा विज्ञान के विकास के बाद इच्छामृत्यु पर बहस फिर शुरू हुई। 20वीं सदी में Aktion T4 program जैसे घटनाक्रमों ने इस विषय को लेकर वैश्विक स्तर पर भय और विवाद पैदा कर दिया।
किन देशों में इच्छामृत्यु को मान्यता?
दुनिया के कई देशों में अलग-अलग रूपों में इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी गई है।
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Netherlands (2001)
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Belgium (2002)
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Canada (2016 – MAiD कार्यक्रम)
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Switzerland (1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या)
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Spain (2021)
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New Zealand (2021 जनमत संग्रह के बाद)
अमेरिका के कुछ राज्यों, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया और कोलंबिया सहित कई देशों में भी सीमित परिस्थितियों में इसे अनुमति दी गई है।
भारत में इच्छामृत्यु पर कानून
भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अब भी अवैध है, लेकिन निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी है।
1. अरुणा शानबाग मामला (2011)
Aruna Shanbaug मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित परिस्थितियों में वैध माना।
2. कॉमन कॉज मामला (2018)
Common Cause की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गरिमापूर्ण मृत्यु को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना और ‘लिविंग विल’ को मान्यता दी।
भारत में क्यों उठती हैं चिंताएं?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था अभी इतनी मजबूत नहीं है कि इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दे को पूरी तरह सुरक्षित तरीके से लागू किया जा सके। आर्थिक दबाव, सामाजिक परिस्थितियां और संपत्ति विवाद जैसे कारकों के कारण इसके दुरुपयोग की आशंका भी जताई जाती है।फिलहाल हरीश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु की बहस को नई दिशा दे रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि कानून, चिकित्सा व्यवस्था और समाज इस जटिल विषय को किस तरह संतुलित रूप से संभालते हैं।
