मालीपुर थानांतर्गत बिश्वा चितौना गाँव के दलित छात्रा की गला घोंटकर ह्त्या, उठते कई सवाल,जिला प्रशासन मौन, लीपापोती से काम नहीं चलेगा |
अंबेडकरनगर के मालीपुर थाना अंतर्गत विश्वा चितौना की दलित छात्रा की ह्त्या से काँप गया जिला
मालीपुर थानान्तर्गत विश्वा चितौना गाँव में दलित छात्रा (17) की हत्या गला घोंटकर की गई है ऐसा पुलिस कहती है । पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं है । ऐसा डॉॅक्टरों के पैनल का कहना है यह भी पुलिस ही कहती है,। हालांकि स्लाइड तैयार कर जांच के लिए लखनऊ भेजने की बात जिला प्रशासन कहा है,हजारों पुलिस की उपस्थित ने विश्वा चितौना गाँव और उसके आसपास के गाँवों में पुलिस के भय का वातावरण बना दिया है इसी भय व दहशत के कारण आम जन मानस कुछ बोलने को तैयार नहीं है,तमाम दावे यु टूबर द्वारा शोसल मीडिया पर किये जा रहे हैं,आलापुर विधायक त्रिभुवन दत्त,पूर्व मंत्री और अकबरपुर विधायक राम अचल राजभर सपा जिला अध्यक्ष जंग बहादुर यादव अकबरपुर सांसद लाल जी वर्मा गाँव गए आरोपियों को पकड़ने की मांग किये, पक्ष विपक्ष के नेताओं का घटनास्थल पर पहुंचना जारी है,वे यहीं तक काम करेंगें उनकी यहीं तक सीमाएं हैं वर्तमान सरकार और कड़क जिला प्रशासन की छवि के आगे वे विवश हैं, राजकीय मेडिकल कालेज के पोस्टमार्टम हाउस से लेकर विश्वा चितौना गाँव से होते हुए नेमपुर घाट की मझुई नदी तक हुए घटना चक्र में समय बड़ा बलशाली है, समय का पहिया पीड़ित परिवार या उसकी बेटी की जघन्य ह्त्या की तरफ नहीं बल्कि उस व्यवस्था की उपज को बचाने में लगा है जिसकी किरकिरी आगे होने वाली है|
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि छात्रा का शव पहुंचने के बाद गांव में बड़ी संख्या में महिलाओं व पुरुषों ने हत्यारों के एनकाउंटर की मांग करने लगे , हंगामा बढते देख जिला प्रशासन के नीचे से जमीन खिसकने लगी उन्हें लगने लगा कि कहीं हाथरस की तरह आग न लग जाए ,चूँकि जिले के प्रशासन में उच्च जातियों का बोलबाला है, उन्होंने निर्णय लेने में देर नहीं किया ,हल्का बल प्रयोग करते हुए लोंगों को राजी कर लिया गया,मझुई नदी के पवित्न घाट पर अपनी छोटी आयु की दुनिया को अलविदा कहते हुए हमेशा के लिए नदी किनारे बने घाट में इस मायावी दुनिया को छोड़ कर पंचतत्व में विलीन हो गई। स्थानीय जनता के गुस्से और गम को पुलिस के बूटों ने दबा दिया, लोंगों के गुस्से को संभालने के लिए गांव को छावनी में तब्दील कर दिया। आईजी प्रवीण कुमार, डीएम अनुपम शुक्ला, एसपी अभिजीत आर शंकर के नेतृत्व में पीएसी के साथ जिले के सभी थानाध्यक्षों ने मय बुलेट प्रूफ जैकेट और हेलमेट के साथ मोर्चा संभाल लिया। लगा जैसे उनके पहरे से कोई और बड़ी बारदात न हो जाए, उसके पहले राजकीय मेडिकल कॉलेज में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच एडीएम डॉ. सदानंद गुप्ता, एसडीएम डॉ. शशिशेखर व सीएमओ डॉ. संजय कुमार शैवाल की निगरानी में तीन डॉक्टरों के पैनल ने छात्रा के शव का पोस्टमार्टम किया । पोस्टमार्टम का सच क्या है यह इन्हीं चिकित्सकों के दल में सम्मलित पैनल के पास ही है क्योंकि पोस्टमार्टम का विश्लेषण और संश्लेषण करने वाले यही विशेषज्ञ हैं|
कुछ सवाल जो परिस्थितियों के पास हैं
विश्वा चितौना गाँव से महारानी गीता देवी इंटर कालेज मालीपुर तक छात्रा के आने जाने के समय उस गाँव के लोगों का भी आना जाना रहा होगा,सडक से किनारे गन्ने के खेत तक छात्रा किसके कहने पर गयी,किसके बुलाने पर गयी कौन था जो उसको काफी दिनों से परेशान कर रहा था,इन छोटी छोटी घटनाओं पर स्कूल प्रबंधन पर नजर थी या नहीं,क्लास टीचर से लेकर प्राचार्य तक लड़कियों के लिए क्या सुरक्षा किये थे,कक्षा १२ में पढ़ने वाली छात्रा को आने जाने वाले रास्तों पर लोफर कहाँ से आते थे क्या कभी शिकायत उसने घर या स्कूल प्रबंधन से किया या नहीं|
ड्रेस पर उठे सवाल
महारानी गीता देवी इंटर कालेज में पढ़ने वाले छात्र और छात्राओं के ड्रेस कोड पर गंभीर सवाल उठे हैं, १७ वर्षीय छात्राएं स्कर्ट पहन कर जा रहीं हैं यह स्कूल प्रबंधन पर गंभीर सवाल खडा करता है,मुख्यालय पर स्थित एक प्रमुख मिशनरी कालेज में कक्षा ७ से ही छात्राओं को सलवार समीज में ड्रेस कोड लागू है, ग्रामीण क्षेत्र में स्थित स्कूल के प्रबंधक और प्राचार्य की कौन सी विवशता थी जो ड्रेस कोड में स्कर्ट लागू किये गए थे,महारानी गीता देवी इंटर कालेज के ड्रेस कोड पर जिला विद्यालय निरीक्षक के कार्य प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाता है|
अन्य स्थानों की घटनाएं भी एक जैसी होती हैं
कुछ साल पहले एक दलित महिला ने शोधकर्ता जयश्री मंगूभाई से कहा था, “हम हिंसा का शिकार इसलिए होते हैं क्योंकि हम गरीब हैं, निचली जाति की हैं और औरतें हैं, इसलिए सब हमें नीची नज़र से देखते हैं। हमारी मदद करने या हमारी आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है। हमें ज़्यादा यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है क्योंकि हमारे पास कोई ताकत नहीं है।”
पिछले हफ़्ते, यह खबर आई कि उत्तर प्रदेश में एक 19 वर्षीय दलित महिला (दलितों को कभी “अछूत” कहा जाता था) के साथ कथित तौर पर उच्च जाति के पुरुषों के एक समूह द्वारा सामूहिक बलात्कार और मारपीट की गई । इस खबर ने भारत की 8 करोड़ दलित महिलाओं के साथ होने वाली व्यापक यौन हिंसा पर फिर से प्रकाश डाला, जो अपने पुरुषों की तरह भारत के कठोर और अडिग जातिगत पदानुक्रम में सबसे निचले पायदान पर हैं।भारत की महिला आबादी का लगभग 16% हिस्सा इन महिलाओं को लैंगिक पूर्वाग्रह, जातिगत भेदभाव और आर्थिक अभाव का “तिहरा बोझ” से दबी हैं । “कास्ट मैटर्स” के लेखक डॉ. सूरज येंगड़े कहते हैं, “दलित महिलाएँ दुनिया के सबसे उत्पीड़ित समूह से संबंधित हैं। वे बाहरी और आंतरिक, दोनों तरह से उत्पीड़न की संस्कृतियों, संरचनाओं और संस्थाओं की शिकार हैं। यह दलित महिलाओं के खिलाफ निरंतर हिंसा में प्रकट होता है।”उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक महिला के साथ कथित तौर पर ऊँची जाति के पुरुषों द्वारा किए गए बलात्कार और हत्या के बाद का घटनाक्रम वैसा ही रहा जैसा आमतौर पर किसी दलित महिला पर हमले के समय होता है: पुलिस शिकायत दर्ज करने में धीमी है; जाँच धीमी है; अधिकारी बलात्कार होने पर संदेह जता रहे हैं; ऐसे संकेत दिए जा रहे हैं कि इसका जाति से कोई लेना-देना नहीं है; और ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी, शायद, हिंसा के ऊँची जाति के अपराधियों का पक्ष लेने में संलिप्त हैं। यहाँ तक कि कुछ मीडियाकर्मी, जिनमें ऊँची जाति के पत्रकारों का दबदबा है, सवाल उठा रहे हैं कि यौन हिंसा को जाति से क्यों जोड़ा जाना चाहिए।दूसरे शब्दों में, भारत में राज्य और समाज के कुछ हिस्से यौन हिंसा और जातिगत पदानुक्रम के बीच संबंधों को कमतर आंकने या मिटाने की साजिश करते हैं। जल्दी ही एक हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर उत्तर परदेश की योगी सरकार ने जाति लिखने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है,लेकिन इससे कुछ बदलने वाला नहीं दिखाई पड़ता है बल्कि ऊँची जातियां यह जरूर करेंगीं जिससे उनको अपराध करने के बाद बचाया जा सके|
पिछले हफ़्ते हाथरस में कथित बलात्कार की घटना के बाद, एक उच्च जाति के नेता द्वारा शासित उत्तर प्रदेश सरकार ने आधी रात को आनन-फानन में पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया और मीडिया व विपक्षी नेताओं को पीड़िता के गाँव और परिवार से मिलने से कुछ समय के लिए रोक दिया, जिससे मामले को छुपाने की आशंकाएँ पैदा हो गईं। एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, सरकार ने एक निजी जनसंपर्क एजेंसी को यह बताने के लिए नियुक्त किया कि यह बलात्कार की घटना नहीं थी।ग्रामीण भारत के बड़े हिस्से में दलित महिलाएँ यौन हिंसा की शिकार रही हैं, जब से कोई याद कर सकता है। इन क्षेत्रों में, ज़मीन, संसाधन और सामाजिक शक्ति का बड़ा हिस्सा ऊँची और मध्यम जातियों के पास है। समुदाय के ख़िलाफ़ अत्याचारों को रोकने के लिए 1989 में बनाए गए क़ानून के बावजूद, दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा में कोई कमी नहीं आई है। उनका पीछा किया जाता है, उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, छेड़छाड़ की जाती है, बलात्कार किया जाता है और उनकी हत्या की जाती है।आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल भारत में हर दिन दस दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। उत्तरी राज्य उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सबसे ज़्यादा मामले और लड़कियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के सबसे ज़्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। दलितों के खिलाफ अत्याचार के आधे से ज़्यादा मामले तीन राज्यों – उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान – में दर्ज किए गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत के चार राज्यों में 500 दलित महिलाओं पर उनके द्वारा सामना की गई हिंसा के स्वरूपों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि 54% महिलाओं पर शारीरिक हमला किया गया, 46% महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया गया, 43% महिलाओं ने घरेलू हिंसा का सामना किया, 23% महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, तथा 62% महिलाओं के साथ मौखिक दुर्व्यवहार किया गया।
