लद्दाख के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक को करीब छह महीने बाद जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में रखा गया था। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनके खिलाफ लगाए गए एनएसए के प्रावधान को वापस ले लिया, जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी का आधार समाप्त हो गया और उन्हें रिहाई मिल गई।सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और बाद में रिहाई को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। आम तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार लोगों को लंबे समय तक हिरासत में रखा जाता है, इसलिए इस मामले में अचानक एनएसए हटाए जाने को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।सूत्रों के अनुसार, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी चल रही थी और अगली सुनवाई 17 मार्च को निर्धारित थी। कुछ जानकारों का मानना है कि अदालत में सरकार की दलीलें कमजोर पड़ सकती थीं, जिससे जल्द रिहाई का आदेश आने की संभावना थी।इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मामले को लेकर चर्चा हुई थी। पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले वांगचुक की गिरफ्तारी पर कई देशों में चिंता जताई गई थी, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ने की बात भी कही जा रही है।सोनम वांगचुक लंबे समय से लद्दाख में पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय संसाधनों से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने क्षेत्र में विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर कई सवाल उठाए थे।
हालांकि सरकार की ओर से एनएसए हटाने के फैसले पर कोई विस्तृत आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के पीछे कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक कारणों का मिश्रण हो सकता है।इस बीच लद्दाख में प्रशासनिक स्तर पर भी कुछ बदलाव किए गए हैं। कुछ स्थानीय नेताओं का कहना है कि क्षेत्र से मिले फीडबैक के बाद सरकार ने स्थिति की समीक्षा की थी।सोनम वांगचुक की रिहाई के बाद अब यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे कड़े प्रावधानों का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए और उनकी समीक्षा कैसे होनी चाहिए।
