सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को सेक्सुअल ऑफेंस के मामलों को कोर्ट में संभालने में सेंसिटिविटी और दया पैदा करने के लिए पूरी ड्राफ्ट गाइडलाइंस बनाने का निर्देश दिया। साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसे नियम भारत के सामाजिक ताने-बाने को दिखाने चाहिए और विदेशी अधिकार क्षेत्रों से उधार नहीं लिए जाने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादित आदेश से जुड़े स्वप्रेरणा (सुओ मोटू) मामले की सुनवाई कर रही थी। यह मामला उस टिप्पणी से संबंधित है, जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ करते हुए उसके स्तन पकड़ना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करना, प्रथम दृष्टया बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता।हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी माना था कि ये कृत्य POCSO एक्ट के तहत ‘गंभीर यौन उत्पीड़न’ (एग्रेवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट) के अंतर्गत आते हैं, जिसके लिए अपेक्षाकृत कम सज़ा का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की व्यापक कानूनी और संवेदनशील पहलुओं के साथ समीक्षा शुरू की।

 सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट  के आदेश पर असहमति जताते हुए इस व्यापक प्रश्न पर विचार किया कि यौन अपराध मामलों की सुनवाई करते समय न्यायाधीशों को सामाजिक पूर्वाग्रहों और पुरुष-प्रधान सोच से मुक्त होकर संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इसके लिए स्पष्ट और प्रभावी दिशा-निर्देश तैयार किए जाने आवश्यक हैं, ताकि ऐसे मामलों में न्याय प्रक्रिया अधिक संवेदनशील और निष्पक्ष बन सके।पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि न्यायपालिका और प्रशासनिक स्तर पर पहले भी इस तरह की संवेदनशीलता विकसित करने के लिए कई पहल की गई हैं। इसके बावजूद, अपेक्षित सुधार पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहे हैं, जिससे यह आवश्यकता और अधिक स्पष्ट हो गई है कि न्यायाधीशों के लिए ठोस और व्यावहारिक गाइडलाइंस तैयार की जाएं।

  सुप्रीम कोर्ट ने  यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जो वर्तमान में नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक हैं, से अनुरोध किया कि वे इस समिति का गठन करें और इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य करें। समिति में उनके अलावा चार अन्य विशेषज्ञ शामिल होंगे, जिनमें विधि क्षेत्र के पेशेवर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहेंगे।अदालत ने स्पष्ट किया कि यह समिति यौन अपराधों और कमजोर पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं तथा गवाहों से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों और न्यायिक प्रणाली के दृष्टिकोण को अधिक संवेदनशील बनाने के लिए व्यापक दिशानिर्देश तैयार करेगी। समिति को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह पहले किए गए न्यायिक और प्रशासनिक प्रयासों की समीक्षा करे, उनके प्रभाव का आकलन करे और जमीनी स्तर पर सामने आए अनुभवों को ध्यान में रखते हुए अपनी सिफारिशें तैयार करे।पीठ ने इस बात पर भी जोर दिया कि दिशा-निर्देश सरल और स्पष्ट भाषा में हों, ताकि सभी वर्गों के लोग उन्हें आसानी से समझ सकें। समिति से यह अपेक्षा की गई है कि वह विभिन्न भाषाओं और बोलियों में प्रचलित ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों की पहचान करे, जो पीड़ितों को आघात पहुंचा सकते हैं, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनका उपयोग टाला जा सके और पीड़ित अपनी बात बिना झिझक और भय के रख सकें।अदालत ने यह भी कहा कि इन दिशानिर्देशों में भारतीय सामाजिक मूल्यों और वास्तविक परिस्थितियों का प्रतिबिंब होना चाहिए और विदेशी न्याय प्रणालियों से लिए गए जटिल शब्दों या अवधारणाओं से बचा जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि 2023 में तैयार जेंडर स्टीरियोटाइप से संबंधित हैंडबुक में कुछ हद तक विदेशी दृष्टिकोण का प्रभाव दिखाई देता था, जिससे सीख लेते हुए अब अधिक भारतीय संदर्भ पर आधारित गाइडलाइंस तैयार करने की आवश्यकता है।कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति जस्टिस बोस को भेजी जाए और दो सप्ताह के भीतर समिति का गठन किया जाए। समिति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मानदेय दिया जाएगा और उसे तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।मामले के कानूनी पहलू पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपों को कम गंभीर धाराओं में बदलना प्रथम दृष्टया उचित नहीं था। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि आरोपियों ने केवल तैयारी नहीं, बल्कि अपराध पीड़ित की चीख-पुकार और गवाहों के हस्तक्षेप के कारण पूरा नहीं हो सका। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी मूल समन आदेश को बहाल करते हुए निर्देश दिया कि मुकदमे की सुनवाई उसी आधार पर आगे बढ़ाई जाए।

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