विपक्षी दलों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जाना संसद की कार्यप्रणाली और संवैधानिक व्यवस्था दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। पिछले कुछ वर्षों में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी ऐसे प्रस्ताव पेश किए गए थे, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया और वे चर्चा के स्तर तक नहीं पहुँच सके। फिर भी, इस तरह की पहल केवल तत्काल राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह व्यापक संवैधानिक और संस्थागत मुद्दों को सामने लाती है।पहला प्रश्न संवैधानिक निरंतरता से जुड़ा है। भारत का संविधान यह सुनिश्चित करता है कि महत्वपूर्ण पदों पर कार्य का प्रवाह बाधित न हो। उदाहरण के लिए, जब जाकिर हुसैन का निधन हुआ था, तब उपराष्ट्रपति वी वी गिरी ने नए चुनाव होने तक राष्ट्रपति के दायित्वों का निर्वहन किया। इसी प्रकार, संसद में भी यह व्यवस्था है कि अध्यक्ष का पद कभी लंबे समय तक रिक्त न रहे और आवश्यक स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध हो।संविधान के अनुसार, लोकसभा द्वारा चुना गया अध्यक्ष तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक नया अध्यक्ष नहीं चुना जाता। नई लोकसभा के गठन के समय एक अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति की जाती है ताकि कार्य बाधित न हो। यदि किसी कारण से अध्यक्ष का पद खाली हो जाए, तो उपाध्यक्ष अस्थायी रूप से जिम्मेदारी संभालता है। ऐसा उदाहरण तब देखने को मिला था जब लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष जी वी मावलनकर का कार्यकाल के दौरान निधन हो गया और उपाध्यक्ष एम ए अय्यंगर ने उनकी जिम्मेदारियाँ संभालीं।हालाँकि, हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद—लोकसभा उपाध्यक्ष—लंबे समय से रिक्त बना हुआ है। 2019 से 2024 तक चली 17वीं लोकसभा में यह पद खाली रहा और वर्तमान लोकसभा में भी अभी तक इस पद पर नियुक्ति नहीं की गई है। इस स्थिति ने एक व्यावहारिक समस्या पैदा कर दी है, क्योंकि यदि अध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्ताव आता है, तो उस पर निर्णय लेने के लिए सामान्यतः उपाध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।संविधान निर्माताओं ने यह कल्पना नहीं की थी कि उपाध्यक्ष का पद इतने लंबे समय तक खाली रहेगा। उन्होंने यह अपेक्षा की थी कि लोकसभा अपने सदस्यों में से किसी एक को शीघ्र ही इस पद के लिए चुनेगी। यह समस्या केवल संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्य विधानसभाओं में भी उपाध्यक्ष के पद रिक्त हैं, जो संवैधानिक संस्थाओं की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।दूसरा और अधिक व्यापक प्रश्न संसद की संस्थागत भूमिका से जुड़ा है। संसद लोकतांत्रिक विमर्श का प्रमुख मंच है, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान, नीति निर्माण और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है। लेकिन पीठासीन अधिकारियों के विरुद्ध अविश्वास प्रस्तावों की बढ़ती संख्या यह संकेत देती है कि राजनीतिक दलों के बीच सहयोग और विश्वास में कमी आई है। संसदीय बहस का स्तर भी अधिक टकरावपूर्ण और व्यक्तिगत होता जा रहा है, जिससे कार्यवाही बाधित होती है।हाल के समय में संसद के कामकाज पर नज़र डालने से यह स्पष्ट होता है कि कई कार्यदिवस व्यवधानों की भेंट चढ़ गए, जिससे विधायी कार्य प्रभावित हुआ। संसद देश की विशाल आबादी के लिए कानून बनाने और शासन को दिशा देने की जिम्मेदारी निभाती है। ऐसे में कार्य में बाधा न केवल समय की हानि है, बल्कि यह राष्ट्रीय हितों को भी प्रभावित कर सकती है।संविधान निर्माताओं ने संसद को व्यापक अधिकार दिए, लेकिन साथ ही यह उम्मीद भी की कि निर्वाचित प्रतिनिधि इन शक्तियों का उपयोग जिम्मेदारी और परिपक्वता के साथ करेंगे। उनसे यह अपेक्षा की गई थी कि वे दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देंगे।भारत की संसदीय प्रणाली ऐतिहासिक रूप से विकसित हुई है और अब समय की मांग है कि इसे अधिक सहयोगात्मक और प्रभावी बनाया जाए। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन संस्थाओं की गरिमा और कार्यक्षमता बनाए रखना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। देश की जनता अपने प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा करती है कि वे संसद की प्रतिष्ठा बनाए रखें और उस विश्वास को कायम रखें जो उन्हें जनता ने सौंपा है।

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