सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में भेदभाव को रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की ओर से जारी नए नियमों पर गुरुवार को रोक लगा दी है. लागू होने के बाद  से सवर्ण जाती के लोग विरोध कर रहे थे, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026’ के प्रावधानों में प्रथम दृष्टया अस्पष्टता है और इनके दुरुपयोग की आशंका है.कोर्ट ने इन नियमों के लागू होने पर फ़िलहाल रोक लगा दी, और सुझाव दिया कि विशेषज्ञों की एक समिति इन नियमों में खामियों को भरने पर विचार कर सकती है,भारत में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन या यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किए थे, ये नियम इसी विषय पर 2012 में लागू किए गए नियमों की जगह जारी किए गए हैं|जिसका सवर्ण जाती के लोग विरोध कर रहे थे उनका कहना था किउच्च शिक्षा संस्थ्यानो में इस कानून से उच्च जाति के लोगों को परेशान किया जायेगा, हालांकि सरकार ने कहा था कि ‘इनका दुरुपयोग नहीं होने देंगे.’

 

                शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि फिलहाल 2012 में यूजीसी के बनाए गए नियम ही लागू रहेंगे,यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि नए नियम कुछ समूहों को अलग-थलग करने वाले हैं, थोड़ी देर चली सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि इस मुद्दे से जुड़े कुछ संवैधानिक और क़ानूनी सवालों की जांच की जानी बाकी है,मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नए नियमों में “अस्पष्टता” है और उनका दुरुपयोग हो सकता है,उन्होंने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह अदालत को एक विशेषज्ञों की समिति का सुझाव दें, जो इस मुद्दे की जांच कर सके. प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यूजीसी को इन याचिकाओं पर अपना जवाब दाख़िल करना चाहिए,

सुप्रीम कोर्ट

मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि नए नियमों का मसौदा तैयार करते समय कुछ पहलुओं की नज़रअंदाज़ किया गया,अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी और इसे रोहित वेमुला की मां की ओर से 2012 के यूजीसी नियमों को चुनौती देने वाली याचिका के साथ सुना जाएगा,जहां 2012 के नियमों में ‘भेदभाव’ की बात की गई थी वहीं 2026 में लाए गए संशोधित नियमों में भेदभाव की परिभाषा में ‘जाति‑आधारित भेदभाव’ को जोड़ा गया है,नए नियमों के मुताबिक़ “जाति-आधारित भेदभाव” का मतलब सिर्फ़ जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध किया जाने वाला भेदभाव है.,नए नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज को समान अवसर केंद्र या इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर स्थापित करना होगा,इस केंद्र का काम वंचित समुदायों के हितों से जुड़ी योजनाओं पर नज़र रखना, छात्रों और कर्मचारियों को पढ़ाई, सामाजिक मामलों और पैसों से जुड़ी सलाह देना, परिसर में विविधता और सबको साथ लेकर चलने का माहौल बढ़ाना और ज़रूरत पड़ने पर ज़िला और राज्य की कानूनी सेवा संस्थाओं की मदद से कानूनी सहायता उपलब्ध कराना होगा,इस केंद्र के तहत एक समता समिति बनाई जाएगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे, इस समिति में वरिष्ठ शिक्षक, सिविल सोसायटी के सदस्य और छात्र शामिल होंगे. यह समिति भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी.नए नियमों के हिसाब से प्रत्येक संस्थान को एक चौबीसों घंटे उपलब्ध ‘समता हेल्पलाइन’ चलानी होगी,अगर किसी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी को लगे कि उसके साथ भेदभाव हुआ है तो वह हेल्पलाइन, ऑनलाइन पोर्टल या समान अवसर केंद्र को ईमेल के ज़रिए शिकायत दर्ज कर सकता है.,अनुरोध करने पर शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जाएगी,

 

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक का मायावती ने किया समर्थन, कहा-सभी पक्षों को विश्वास में लेना चाहिए था (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

            बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा देश के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में लागू किए गए नए नियमों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के नए नियमों पर लगाई गई रोक वर्तमान परिस्थितियों में उचित निर्णय है। मायावती ने अपने बयान में कहा कि इन नियमों के लागू होने से सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा हुआ है, और यदि आयोग ने इन्हें लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लिया होता, तो ऐसी स्थिति नहीं बनती।बसपा प्रमुख ने लिखा कि विश्वविद्यालयों में जातिवादी घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से लाए गए नए नियमों को लागू करने की प्रक्रिया में पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया। उनके अनुसार, आयोग को नियम लागू करने से पहले संबंधित वर्गों और समुदायों से संवाद करना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि जांच समितियों में “नेचुरल जस्टिस” (प्राकृतिक न्याय) के सिद्धांतों के तहत सभी वर्गों, विशेषकर अपरकास्ट समाज को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए था। मायावती के अनुसार, यदि यह प्रक्रिया अपनाई जाती, तो सामाजिक तनाव जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

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