वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की महत्वपूर्ण बैठक दाओस में हुई है, जिसमें कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका के दबदबे को चुनौती देते हुए भाषण दिया, उन्होंने कहा कि दुनिया के लगभग हर देश ट्रंप की नीतियों से परेशान हैं,मार्क कार्नी ने कहा कि ताक़तकवर देशों की प्रतिद्वंद्विता में मिडिल पावर वाले देशों के सामने दो विकल्प हैं- या तो समर्थन पाने के लिए आपस में होड़ करें या साहस के साथ एक तीसरा रास्ता बनाने के लिए साथ आएं,मार्क कोनी ने यह बोलकर जोखिम उठाया है, जबकि भारत समेत दुनिया के बाक़ी देशों को लग रहा है कि अभी चुप रहना ज़्यादा बेहतर है,दूसरी तरफ़ कनाडा के प्रधानमंत्री को लग रहा है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था में कोई संक्रमण नहीं बल्कि विध्वंस की स्थिति है और झूठ का पर्दा हट रहा है।
मार्क कार्नी खुलेआम कह रहे हैं कि पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आएगी और इसका शोक नहीं मनाना चाहिए बल्कि नई और इंसाफ़ सुनिश्चित करने वाली वैश्विक व्यवस्था के लिए काम शुरू कर देना देना चाहिए। मार्क कार्नी ने अपने भाषण में कहा था, ”शक्तिशाली देशों के पास उनकी शक्ति है. लेकिन हमारे पास भी कुछ है: दिखावा बंद करने की क्षमता, वास्तविकताओं को नाम देने की क्षमता, अपने घर में अपनी ताक़त बनाने की क्षमता और मिलकर कार्रवाई करने की क्षमता. यही कनाडा का रास्ता है. हम इसे खुले और आत्मविश्वास के साथ चुनते हैं और यह रास्ता हर उस देश के लिए खुला है जो हमारे साथ अपनाने को तैयार हैं.”
भारत मौन है,
भारत अभी चुप है लेकिन जब बोल रहा था तो ख़ुद को ऐसे पेश कर रहा था, मानो महाशक्ति बनने की रेस में आ चुका है,भारत ख़ुद को एक बड़ी शक्ति के रूप में पेश कर रहा था जबकि ऐसा अभी हो नहीं पाया है,इस मामले में हमें चीन से सीखना चाहिए कि जो बोलता कम है और करता ज़्यादा है.”कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा कि ताक़तवर देशों की आपसी लड़ाई में फँसकर मिडिल पावर वाले या विकासशील देशों को अपना नुक़सान नहीं करना चाहिए, कार्नी ने यह भी कहा कि मिडिल पावर वाले देशों को आपसी सहयोग बढ़ाना चाहिए,ये कोई नया सिद्धांत नहीं है,भारत में नेहरू से लेकर वाजपेयी तक ने इसी सिद्धांत का पालन किया,लेकिन परमाणु क़रार के बाद से भारत ने यह फ़ैसला किया कि अमेरिका उसका रणनीतिक साझेदार है, इसके बाद से अमेरिका और भारत के संबंध गहरे होते गए, जब तक अमेरिका का साथ रहा, तब तक भारत की रणनीतिक स्वायत्तता सुरक्षित रही,नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद भारत ने बिल्कुल अलग रुख़ अपनाया, भारत ने ख़ुद को मिडिल पावर से ज़्यादा की हैसियत में पेश करना शुरू किया, इस चक्कर में भारत ने कई सारे बयान दिए और ये बयान ही अब भारत को उलटा पड़ रहे हैं,
