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13 अगस्त 1996. इलाहबाद के सिविल लाइन्स का इलाका. UP-70 E-3479 नम्बर की एक सफ़ेद मारुति कार हनुमान मंदिर चौराहे से पत्थर गिरिजाघर की तरफ बढ़ रही थी. इस कार के ठीक पीछे एक टाटा सूमो भी चल रही थी. सुभाष चौराहे के आगे पैलेस सिनेमा के पास एक सफ़ेद रंग की टाटा सिएरा ने मारुति कार को ओवरटेक किया. मारुति कार के ड्राइवर गुलाब यादव को कुछ गड़बड़ का अंदेशा हुआ. वो बगल से टाटा सिएरा को ओवरटेक करने की सोच ही रहे थे कि बगल वाली लेन में एक और गाड़ी उनके बराबर चलने लगी. सफ़ेद रंग की मारुति वैन. जिसका नंबर था, UP-70 8070. आगे चल रही टाटा सिएरा अचानक से रुक गई. गुलाब यादव के पास बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं था.बगल की लेन में चल रही मारुति वैन से चार लोग उतरे. कपिल मुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया, उदयभान करवरिया और श्याम नारायण करवरिया उर्फ़ मौला महाराज. आगे रुकी हुई टाटा सिएरा से तावदार मूंछो वाला एक और शख्स नीचे उतरा. नाम रामचन्द्र त्रिपाठी उर्फ़ कल्लू. इन पांचो लोगों के हाथ में हथियार थे. रायफल, रिवॉल्वर और एके-47. मारुति कार और उसके पीछे चल रही टाटा सूमो में बैठे कुल आधा दर्जन लोगों के होश फाख्ता हो गए.हाथ में एके-47 थामे मौला महाराज ने मारुति कर में बैठे एक शख्स को नाम लेकर ललकारना शुरू किया. ‘बाहर निकलो जवाहर पंडित’. और इसके बाद सिविल लाइंस गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. पांचो लोगों ने मारुति कार पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं. यह पहली बार था जब इलाहाबाद में एके-47 की तड़तड़ाहट सुनाई दे रही थी. आधे मिनट के भीतर जवाहर पंडित के शरीर में दस गोलियां धंस चुकी थीं. जवाहर पंडित के साथ बैठे कल्लन यादव और ड्राइवर गुलाब यादव को भी गोलियां लगी थीं. गुलाब और जवाहर यादव ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. जबकि कल्लन चमत्कारिक तौर पर जानलेवा जख्म से उबरने में कामयाब रहे. हालांकि घटना के कुछ समय बाद ही उनकी बीमारी के चलते मौत हो गई|
यह उस समय की बात है जब प्रयागराज को इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था और कौशाम्बी अलग जिला नहीं बना था. दीवारों पर आलते से लिखा ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ अभी पूरी तरह से मिटा नहीं था. हालांकि राम के नाम पर छोड़े गए बीजेपी के रथ के पहिए को उत्तर प्रदेश में तोड़ दिया गया था. मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी और उत्तर प्रदेश दोनों के सदर थे. अस्सी का दशक ढलान पर था और जवाहर लाल नेहरु के इलाहाबाद में एक और जवाहर अपने उरूज पर था. नाम था जवाहर यादव. देवी में अटूट आस्था थी. सुबह-शाम घंटो पूजा-पाठ किया करता. दुर्गा सप्तशती कंठस्थ. चंदन चर्चित ललाट. यही वजह थी कि लोग जवाहर को पंडित के नाम से बुलाने लगे थे. छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र और कुंवर रेंवती रमण सिंह जैसे समाजवादी बरगदों की छांव से छिटककर उगे जंगली बिरवे जैसा. कहते हैं कि जवाहर पंडित जब भाषण देते तो समा बांध देते. उन्हें इलाहाबाद में मुलायम सिंह यादव का सबसे करीबी आदमी माना जाता था.
उत्तर प्रदेश में एक अलिखित कायदा है. जिसकी सरकार, उसका माफिया. बालू, शराब, सड़क, रेलवे जैसे जितने भी सरकारी ठेके होते हैं सब सत्ताधारी पार्टी के ‘कार्यकर्ताओं’ के नाम पर छूटते हैं. जवाहर अब माननीय विधायक थे. मुख्यमंत्री के करीबी भी. लिहाजा वो पार्टी के सबसे योग्य कार्यकर्ता थे. ठेकों में उन्हें नजरअंदाज करना प्रशासन के बूते के बाहर की बात थी,”अपनी बालू हैलीकॉप्टर से उठवाओ.”1993 में सरकार बदलने के बाद करवरिया परिवार बैकफुट पर आ गया. जवाहर यादव ने बालू के ठेकों को तेजी से अपने कब्जे में लेना शुरू किया. करवरिया परिवार के पास बालू खुदाई के लिए बहुत कम जमीन बची थी. इस जमीन के चारो तरफ जवाहर पंडित की जमीन थी. करवरिया के ट्रकों के पास निकलने के लिए जगह नहीं थी. लिहाजा उन्हें गंगा किनारे से सड़क तक जाने के लिए जवाहर पंडित को आवंटित जमीन से होकर निकलना होता था. जवाहर पंडित, करवरिया परिवार को बालू के धंधे से पूरी तरह बाहर धकेलने में लगे हुए थे. उन्होंने करवरिया के ट्रक अपने जमीन से निकलने पर पाबंदी लगा दी. करवरिया खानदान का बचा-खुचा धंधा भी ठप पड़ गया.
करवरिया बंधुओं ने जवाहर पंडित से शांतिवार्ता का प्रस्ताव रखा. लेकिन बातचीत बेहद अप्रिय मोड़ पर खत्म हुई. करवरिया परिवार के करीबी बताते हैं कि विधायक जवाहर पंडित ने मौला महाराज पर रायफल तान दी और कहा,
“चाहे अपनी बालू हैलिकॉप्टर से उठावाओ, लेकिन मेरी ज़मीन से तुम्हारे ट्रक नहीं गुजरेंगे.”
इस मुलाकात के बाद तय हो गया था कि अब गंगा किनारे की बालू पर खून के छींटे गिरने जा रहे हैं. 1996 आते-आते उत्तर प्रदेश का सियासी मौसम काफी बदल चुका था. गेस्ट हाउस कांड हो चुका था. समाजवादी पार्टी की सरकार जा चुकी थी. सूबे में राष्ट्रपति शासन अमल में था. जवाहर पंडित को अंदाजा था कि करवरिया परिवार उनसे हिसाब बराबर करने की फिराक में है. विधानसभा भंग होने के बाद उनको मिली सरकारी सुरक्षा खत्म हो चुकी थी. लिहाजा जान पर खतरे की आशंका जताते हुए उन्होंने प्रशासन से दो दफा सुरक्षा भी मांगी थी. लेकिन उनकी अर्जी पर किसी ने कान नहीं दिया.कहते हैं, गंगा की बालू खून मांगती है. राजनीति के रास्ते से जवाहर गंगा किनारे की नरम बालू पर पैर जमा रहे थे. लेकिन वहां एक घड़ियाल पहले से पड़ा सुस्ता रहा था. नाम, श्याम नारायण करवरिया उर्फ़ मौला महाराज. पुराने शहरों में आपको कई लोग मिल जाएंगे जो पीढ़ियों से मिठाई बना रहे हैं, फर्नीचर बना रहे हैं, कालीन बना रहे हैं. मौला महाराज पीढ़ियों से दबंग थे. उनके पिता जगत नारायण करवरिया की कौशांबी में धाक थी. जवानी के दिनों में वो अपने भाई विशिष्ट नारायण करवरिया ऊर्फ भुक्खल महाराज के साथ इलाहाबाद आए. फैमिली बिजनेस बढाने के लिए. 1970 के दशक में दोनों भाई इलाहाबाद में रियल स्टेट के धंधे के बेताज बादशाह बनकर उभरे. शहर में घर खाली करवाने के मामले में सिद्धहस्त. काफी संपत्ति बनाई.

जालंधर में पैदा हुए उपेंद्रनाथ अश्क इलाहाबाद में बस गए थे. (फोटो- सोशल मीडिया)
कहते हैं कि भुक्खल महाराज इलाहाबाद में सिर्फ एक ही आदमी से मकान खाली नहीं करवा पाए थे. और वो आदमी कोई छंटा हुआ शोहदा नहीं था. कागद काले करने वाला एक साहित्यकार था. नाम था उपेंद्रनाथ ‘अश्क’. उपेंद्रनाथ खुसरोबाग़ के एक मकान में सालों से किराए पर रहते आए थे. मकान मालिक वो मकान बेचना चाहता था. उपेंद्रनाथ ने उनसे वो मकान खरीदने की सोची. अभी बात चल ही रही थी कि भुक्खल महाराज के गुर्गों को खबर हो गई. महाराज ने अपने दांत उस मकान पर गड़ा दिए. उपेंद्रनाथ अश्क को धमकी मिलने लगी. पैसे का लालच भी दिया गया. लेकिन वो नहीं माने. जब दबाव ज्यादा बढ़ने लगा तो उन्होंने दिल्ली का रास्ता लिया. कोशिश की कि इंदिरा गांधी से मुलाकात हो सके. लेकिन अधिकारियों ने ऐसा होने नहीं दिया.
उपेंद्रनाथ अश्क ने इंदिरा से मिलने की एकदम इलाहाबादी तरकीब निकाली. प्रधानमंत्री के काफिले के आगे लेट गए. जब पूछताछ हुई तो सारा हाल कह सुनाया. इंदिरा ने उन्हें गाड़ी में बिठाया. प्रधानमंत्री कार्यालय में ले गईं. मामला वाया पीएमओ होते हुए इलाहाबाद पहुंचा. 24 घंटे में रिपोर्ट देने के लिए कहा गया. इलाहाबाद प्रशासन में हड़कंप मच गया. 3 घंटे के भीतर भुक्खल महाराज को जिले के डीएम सोनकर के सामने हाजिर कर दिया गया. डीएम सोनकर ने भुक्खल महाराज से पूछा,
“आप जानते हैं कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी की नौकरी पर आती है तो वो क्या करता है?”जवाब में भुक्खल महाराज चुप रहे. सोनकर ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा,“वो जिंदा गाड़ देता है. अगर आज के बाद उपेंद्रनाथ अश्क के घर की तरफ आंख उठाकर देखा तो मैं जिंदा गाड़ दूंगा.”उपेंद्रनाथ अश्क नामी साहित्यकार थे. लिहाजा वो भुक्खल महाराज के पंजे से बच गए. लेकिन इलाहाबाद में ऐसा दूसरा उदहारण खोजने पर भी नहीं मिलता. 1980 के दशक में भुक्खल महाराज ने प्रॉपर्टी पर कब्जे के धंधे से अलावा एक और धंधे में अपना पैर जमाना शुरू किया. बालू का धंधा. सरकार गंगा और जमुना के किनारे बालू खोदने का ठेका देती है. भुक्खल महाराज बालू के ठेकदार हो गए. इस धंधे में पैसा अच्छा था. देखते ही देखते गंगा किनारे की सारी जमीन पर भुक्खल महाराज के ट्रक गड़गड़ाने लगे. ठेका किसी के नाम हो, बालू भुक्खल महाराज ही उठाते थे. साल 1991 में भुक्खल महाराज की संदिग्ध सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. अब करवरिया परिवार के कारोबार को संभालने का जिम्मा आ गया उनके भाई मौला महाराज और भतीजों सूरजभान, उदयभान और कपिलमुनि करवरिया के कंधों पर आ गयी ,मूलरूप से कौशांबी के मंझनपुर के चकनारा गांव के रहने वाले करवरिया परिवार को पूरे इलाहाबाद में दबंगई के लिए जाना जाता है, पहले रियल एस्टेट फिर बालू के ठेकों पर उनका वर्चस्व था।
उदयभान करवरिया इस परिवार के पहले सदस्य थे, जिन्होंने सियासी जीत हासिल की थी। इससे पहले उनके दादा जगत नारायण करवरिया 1967 में सिराथू सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे, लेकिन हार हाथ लगी थी। फिर उदयभान के पिता विशिष्ट नारायण करवरिया ऊर्फ भुक्खल महाराज ने इलाहाबाद उत्तरी और दक्षिणी विधानसभा से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें भी जीत नहीं मिली।वर्ष 1997 में उदयभान करवरिया कौशांबी जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। इसके बाद साल 2000 में पंचायत चुनाव हुए और उदयभान के बड़े भाई कपिल मुनि करवरिया ने कौशांबी के जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीता। वर्ष 2002 में उदयभान ने इलाहाबाद की बारा सीट पर पहली बार बीजेपी को जीत दिलाई और विधायक बने। 2007 के विधानसभा चुनाव में उदयभान को भाजपा ने फिर बारा से टिकट दिया और उदयभान फिर से विधायक बने। इलाहाबाद की 12 विधानसभा सीटों में से केवल बारा ही भाजपा जीतने में सफल रही थी। 2012 में बारा की विधानसभा सीट सुरक्षित हो गई। उदयभान बारा छोड़ इलाहाबाद उत्तरी से लड़े, लेकिन यहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
कलराज मिश्रा ने दी थी करवरिया बंधुओं के पक्ष में गवाही
जवाहर पंडित हत्याकांड में तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्रा ने कपिलमुनि करवरिया के पक्ष में गवाही दी थी। दरअसल, पंडित की हत्या के बाद उनके भाई सुलाकी यादव ने हत्याकांड में कपिल मुनि करवरिया, उदय भान करवरिया, सूरजभान करवरिया, श्याम नारायण करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी को नामजद किया था। इसमें से श्याम नारायण करवरिया उर्फ़ मौला महाराज (उदयभान के चाचा) की 1996 में मौत हो गई थी। तीनों भाइयों ने दावा किया कि वे घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे। कपिल मुनि करवरिया ने दावा किया था कि वो उस दिन इलाहाबाद में नहीं थे और उन्होंने अपना पूरा दिन बीजेपी नेता कलराज मिश्र के साथ बिताया था। कलराज मिश्र ने इस बयान के पक्ष में तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी को खुला खत लिखा था और मामले की सीबी सीआईडी जांच की मांग की थी। कलराज मिश्र कपिलमुनि के पक्ष में गवाही भी देने आए थे, लेकिन कोर्ट ने उनकी गवाही को स्वीकार नहीं किया था।वर्ष 2012 में यूपी में सपा की सरकार बनते ही जवाहर पंडित हत्याकांड की सुनवाई तेज हो गई। वर्ष 2013 में हाईकोर्ट ने मामले की कार्यवाही में लगा स्टे खारिज कर दिया और लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे उदयभान को गिरफ्तार करने का वारंट निकाल दिया। उदयभान दो महीने फरार रहे। एक जनवरी 2014 को उन्होंने सरेंडर कर दिया। बाद में कपिल मुनि और सूरजभान भी जेल चले गए। तीनों भाई जेल चले गए, तो बीजेपी ने उदयभान की पत्नी नीलम को मेजा सीट से चुनाव लड़ाया। बीजेपी ने पहली बार इस सीट पर जीत हासिल की।
बीजेपी सरकार ने की थी केस वापसी की पैरवी

जिसकी सत्ता उसके घाट. उसकी बालू और उसकी ही शराब. ( सांकेतिक तस्वीर- AP)

कल्याण सिंह और केशरीनाथ त्रिपाठी के साथ उदयभान करवरिया. (फोटो- सोशल मीडिया)
”हम तो शहर में नहीं थे”जवाहर पंडित के भाई सुलाकी यादव की तहरीर पर कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया, सूरजभान करवरिया, श्याम नारायण करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी को इस हत्याकांड में आरोपी बनाया गया था. इसमें से श्याम नारायण करवरिया उर्फ़ मौला महाराज की 1996 मौत हो गई. करवरिया बंधुओं ने अपने बचाव में जांचा-परखा तर्क दिया कि वो घटना स्थल पर मौजूद नहीं थे. कपिलमुनि करवरिया ने दावा किया कि वो उस दिन इलाहाबाद में नहीं थे. वो किसी दूसरे जिले में थे और उन्होंने अपना पूरा दिन बीजेपी नेता कलराज मिश्र के साथ बिताया. इस सिलसिले में कलराज मिश्र ने तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी को खुला खत लिखा था जिसे उस समय के अखबारों छापा भी था. यहां तक कि कलराज मिश्र कपिलमुनि के पक्ष में गवाही भी देने आए थे. लेकिन अदालत ने उनकी गवाही को स्वीकार नहीं किया.उदयभान करवरिया ने भी कुछ इसी किस्म का दावा किया. उन्होंने कहा कि घटना के वक़्त वो भी शहर से बाहर थे. लेकिन अदालत ने उनके तर्क भी ख़ारिज कर दिया. अपर सेशन जज बद्री विशाल पाण्डेय ने अपने फैसले में लिखा कि उदयभान के दावे को इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वो इस सम्बन्ध में कोई रसीद या टिकट उपलब्ध नहीं करवा पाए.सूरजभान करवरिया ने भी अदालत से कहा कि वो मौके पर मौजूद नहीं थे. सूरजभान ने कहा कि वो घटना के वक़्त रसूलाबाद घाट पर मौजूद थे. सबूत के तौर पर उन्होंने अदालत में एक फोटोग्राफ भी उपलब्ध करवाया था. अदालत ने फोटो की सच्चाई जानने के लिए सूरजभान से नेगेटिव मांगा था. लेकिन सूरजभान नेगेटिव उपलब्ध नहीं करवा पाए. लिहाजा उनका दावा भी ख़ारिज कर दिया गया.4 नवंबर 2019 इस हत्याकांड में फैसला आया. अदालत ने चारों आरोपियों को भारतीय दंड सहिंता की धारा 302, 307, 147, 148, 149 और क्रिमिनल लॉ अमेंमेंट एक्ट की धारा 7 के तहत दोषी पाया. अदालत ने चारों दोषियों को सश्रम उम्रकैद और 7.20 लाख जुर्माने की सजा सुनाई.

इलाहाबाद के कल्याणी देवी स्थित करवरिया कोठी.
तीन पीढ़ी में खड़ा किया साम्राज्य 4 अक्टूबर 2018. करवरिया बंधुओं को सजा होने के ठीक 13 महीने पहले उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से इलाहाबाद सेशन कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की गई थी. इस अर्जी में कहा गया था कि करवरिया बंधुओं के के खिलाफ आरोप साबित होने के लिहाज से पर्याप्त सबूत नहीं है. लिहाजा सरकार करवरिया बंधुओं के खिलाफ मुकदमा वापस लेना चाहती है. सरकार के इस फैसले के खिलाफ जवाहर पंडित की पत्नी विजमा यादव हाईकोर्ट गई थीं. हाईकोर्ट ने सरकार की इस अपील को ख़ारिज करते हुए मुकदमा जारी रखने के निर्देश दिए. यह बहुत दुर्लभ मौका था जब सरकार एक विधायक की हत्या के मामले में मुकदमा उठाने को तैयार थी. सरकार की अपील भले ही हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दी हो लेकिन यह करवरिया खानदान के सियासी रसूख की गवाही तो थी ही. जो कौशांबी के एक छोटे से गांव से शुरू हुई थी और इलाहाबाद और उसके आस-पास के जिलों में फ़ैली थी.

सजा सुनाए जाने के बाद कपिलमुनि करवरिया को लेकर जाती पुलिस
कौशांबी के मंझनपुर के चकनारा गांव के रहने वाले जगत नारायण करवरिया 1967 में सिराथू सीट से चुनावी मैदान में उतरे. लेकिन सफलता नहीं मिली. जगत नारायण की विरासत को आगे बढ़ाया उनके बेटे विशिष्ट नारायण करवरिया ऊर्फ भुक्खल महराज ने. भुक्खल महराज ने इलाहाबाद उत्तरी और दक्षिणी विधानसभा से निर्दलीय किस्मत आजमाई. लेकिन जीत नहीं मिली. जीत मिली परिवार की तीसरी पीढ़ी को. साल 1997 में भुक्खल महराज के मंझले बेटे उदयभान करवरिया कौशांबी जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने. लगभग तीन दशक तक कोशिश करने के बाद करवरिया परिवार का कोई सदस्य चुनाव जीतने में कामयाब हुआ था.

सूरजभान करवरिया का कहना है कि जिस समय ये घटना हुई उस वक्त वे रसूलाबाद घाट पर मौजूद थे. लेकिन कोर्ट ने उनका तर्क खारिज कर दिया.
साल 2000 में पंचायत चुनाव हुए और भुक्खल महराज के बड़े बेटे कपिलमुनि करवरिया कौशांबी के जिला पंचायत अध्यक्ष बने. साल 2002 में विधानसभा चुनाव हुए और उदयभान ने पहली बार इलाहाबाद की बारा सीट पर कमल खिलाया. उन दिनों इलाहाबाद के सांसद हुआ करते थे भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी. उदयभान मुरली मनोहर के खास लोगों में से थे. भुक्खल महराज के सबसे छोटे बेटे सूरजभान ने 2005 में राजनीति में कदम रखा और मंझनपुर के ब्लॉक प्रमुख बने. 2007 में सूरजभान एमएलसी बने और ब्लॉक प्रमुख का पद छोड़ दिया. 2007 के विधानसभा चुनाव में उदयभान को भाजपा ने फिर बारा से टिकट दिया और उदयभान फिर से विधायक बने. इलाहाबाद की 12 विधानसभा सीटों में से केवल बारा ही भाजपा जीतने में सफल रही थी. डॉ. जोशी इलाहाबाद से जा चुके थे और उदयभान क्षेत्र में भाजपा के सबसे मजबूत नेता के तौर पर उभरने लगे थे. 2009 के चुनाव में कपिलमुनि ने भाजपा से लोकसभा का टिकट मांगा. लेकिन बात नहीं बनी. कपिलमुनि ने भाजपा छोड़ बसपा का दामन थाम लिया. फूलपुर से हाथी के निशान पर चुनाव लड़े और जीते. बसपा पहली बार फूलपुर से जीती थी और सांसद बने थे कपिलमुनि.

उदयभान करवरिया का कहना है कि सजा उनके पॉलिटिकल स्टेटस को देखते हुए सुनाई गई है. इसलिए वे हाईकोर्ट जाएंगे.2012 में बारा की विधानसभा सीट सुरक्षित हो गई. उदयभान बारा छोड़ इलाहाबाद उत्तरी से कमल के निशान पर लड़े. लेकिन यहां उन्हें कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह से हार झेलनी पड़ी. 2012 में उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनी. और सरकार बदली तो जवाहर पंडित हत्याकांड की सुनवाई में तेजी आई. 2013 में हाईकोर्ट ने मामले की कार्यवाही में लगा स्टे खारिज कर दिया. और लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे उदयभान को गिरफ्तार करने का वारंट निकाल दिया. उदयभान दो महीने फरार रहे. 1 जनवरी 2014 को सरेंडर किया. बाद में कपिलमुनि और सूरजभान भी जेल चले गए. उदयभान को तो टिकट नहीं मिला लेकिन कपिलमुनि पर बसपा ने एक बार फिर विश्वास जताया और 2014 में फूलपुर से मैदान में उतारा. लेकिन जीते नहीं. जीते केशव प्रसाद मौर्य. तीनों भाई जेल चले गए तो उदयभान की पत्नी नीलम चुनावी मैदान में उतरीं. 2017 में भाजपा ने मेजा विधानसभा सीट से उन्हें टिकट दिया. नीलम मेजा विधानसभा से पहली बार भाजपा को जिताने में सफल रहीं.

पति की हत्या के बाद विजमा यादव राजनीति में उतरीं. विजमा दो बार झूंसी से और एक बार प्रतापपुर से विधायक बनीं. (फोटो- फेसबुक)
पति के हत्या के बाद घूंघट से निकल शुरू की राजनीति
जवाहर पंडित से विजमा की शादी 1990 में हुई थी. महज छह साल बाद ही जवाहर की हत्या हो गई. घूंघट से बाहर निकल विजमा ने पति की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया. 1996 में विधानसभा चुनाव हुए. समाजवादी पार्टी ने विजमा को झूंसी से अपना प्रत्याशी बनाया. 12 हजार वोटों से जीतकर विजमा विधानसभा पहुंचीं. 2002 में विजमा फिर झूंसी से विधानसभा पहुंची और मार्जिन इस बार बढ़कर 18 हजार हो गया. 2007 में विजमा एक बार फिर से झूंसी से चुनावी मैदान में थी लेकिन जीत की हैट्रिक न लगा सकीं. झूंसी से बसपा के प्रवीण पटेल के हाथों उन्हें हार झेलनी पड़ी. 2012 में समाजवादी पार्टी ने विजमा की सीट बदल दी और उन्हें प्रतापपुर से मैदान में उतारा. विजमा तीसरी बार विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहीं.

हत्या से एक दिन पहले ही जवाहर पंडित लखनऊ गए थे और बड़ी बेटी ज्योति और बेटे हॉस्टल में छोड़कर आए थे. 2016 में ज्योति फूलपुर की ब्लॉक प्रमुख बनीं. (फोटो- फेसबुक)
2017 में फिर से विजमा प्रतापपुर से चुनाव मैदान में उतरीं लेकिन उन्हें हार झेलनी पड़ी. विजमा के साथ उनकी बड़ी बेटी ज्योति यादव भी राजनीति में सक्रिय हैं. ज्योति 2016 में फूलपुर ब्लॉक से ब्लॉक प्रमुख बनीं. हालांकि साल भर बाद ही उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ गया और उन्हें पद छोड़ना पड़ा. करवरिया बंधुओं को सजा सुनाए जाने के बाद विजमा ने फैसले पर संतुष्टि जताई है. उनका कहना है कि अगर करवरिया बंधु हाईकोर्ट जाएंगे तो हम वहां भी लड़ेंगे.
