मतदाता सूची में बदलाव की ये प्रक्रिया पूरी हो चुकी है लेकिन इसे लेकर
सवाल अब भी उठ रहे हैं.स्वराज अभियान के समन्वयक योगेंद्र यादव ने 2003 में हुए गहन पुनरीक्षण के दिशानिर्देशों की कॉपी जारी करते हुए आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने 2003 में हुए आईआर (इंटेंसिव रिवीज़न) की प्रक्रिया को लेकर झूठे दावे किए.योगेंद्र यादव ने 2003 के आईआर और 2025 के एसआईआर के बीच तुलना करते हुए तीन बड़े दावे किए हैं.चुनाव आयोग ने दावा किया था कि साल 2003 में भी एन्यूमरेशन हुआ था, लोगों ने एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरे थे और 21 दिन के भीतर सब कुछ हो गया था.हालांकि, 2003 के दिशानिर्देशों के मुताबिक़ इस पुनरीक्षण में एन्यूमरेशन फ़ॉर्म नहीं भरे गए थे.योगेंद्र यादव के मुताबिक़, “2003 में कोई एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरा ही नहीं गया था और ना ही लोगों को कोई समयसीमा दी गई थी. एन्यूमरेटर यानी बीएलओ को कहा गया था कि तुम घर-घर जाओ और फ़ॉर्म भरो और पुरानी वोटर लिस्ट में अगर कोई संशोधन हो तो परिवार के मुखिया के हस्ताक्षर करवा लो.”2025 में एसआईआर की प्रक्रिया के तहत मतदाताओं से एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरने के लिए कहा गया और उन मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए जिन्होंने फ़ॉर्म नहीं भरे.योगेंद्र यादव ने दावा किया है कि साल 2003 में पुनरीक्षण के तहत मतदाताओं ने एन्यूमरेशन फ़ॉर्म नहीं भरे थे बल्कि बीएलओ ने डेटा भरा था.चुनाव आयोग ने तर्क दिया है कि साल 2003 में लोगों को सिर्फ़ चार दस्तावेज़ में से एक देने के लिए कहा गया था जबकि इस बार मतदाताओं के पास 11 दस्तावेज़ में से कोई एक उपलब्ध करवाने का विकल्प था.हालांकि योगेंद्र यादव ये दावा करते हैं कि 2003 के दिशानिर्देशों के मुताबिक़, आम मतदाताओं से दस्तावेज़ नहीं मांगे गए थे. दस्तावेज़ सिर्फ़ उन लोगों से मांगे गए थे जिनकी उम्र या पते के बारे में ग़लत जानकारी दर्ज कराई गई थी.2025 में हुए एसआईआर के तहत मतदाताओं से दस्तावेज़ों की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी.सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद चुनाव आयोग ने आधार कार्ड को भी मतदाता सूची में शामिल होने के लिए वैध दस्तावेज़ माना था. हालांकि, जब एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हुई थी तब आधार कार्ड वैध दस्तावेज़ों की सूची में शामिल नहीं था.
तब नागरिकता की कोई जांच नहीं हुई
इस साल जून में जब चुनाव आयोग ने एसआईआर को लेकर आदेश जारी किया था तब यह स्पष्ट कहा गया था कि इस प्रक्रिया का एक मक़सद अवैध नागरिकों को भी मतदाता सूची से हटाना है.एसआईआर की प्रक्रिया को नागरिकता की जांच से जोड़कर भी देखा गया.हालांकि, 2003 में हुए गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाताओं की नागरिकता की कोई जांच नहीं की गई थी.दिशानिर्देशों के पैरा 32 में ये स्पष्ट कहा गया था कि एन्यूमरेटर का ये काम नहीं है कि वह नागरिकता की जांच करें.दिशानिर्देशों में कहा गया, “ये स्पष्ट किया जाता है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करना एन्यूमरेटर का काम नहीं है. हालांकि उनके पास ये अधिकार है और ज़िम्मेदारी भी कि वो उम्र या निवास स्थान के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर कर सकते हैं.”हालांकि, 2003 में भी नागरिकता की जांच के लिए दो अपवाद थे. पहला, अगर मतदाता पहली बार पंजीकरण करा रहा हो तो निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) आवश्यक समझे तो नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ मांग सकते थे.दूसरा अपवाद उस स्थिति में था जब किसी क्षेत्र को सरकार ने पर्याप्त संख्या में विदेशी नागरिकों वाला क्षेत्र घोषित किया हो. हालांकि, ऐसे इलाक़ों में भी मौजूदा मतदाताओं को नागरिकता साबित करने की ज़रूरत नहीं थी.ऐसे इलाक़ों में एन्यूमरेटर (गणनाकर्ता) सूची में नए नाम सिर्फ़ ऐसे लोगों के ही जोड़ सकते थे जिनके परिजनों के नाम पहले से मतदाता सूची में शामिल हों. नए आवेदन के मामले में ईआरओ, मौजूदा क़ानूनों के तहत नागरिकता साबित करने से जुड़े दस्तावेज़ मांग सकते थे.हालांकि, साल 2025 की एसआईआर प्रक्रिया के दौरान, नागरिकता साबित करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन्हीं मतदाताओं तक सीमित नहीं थी जो पहली बार नाम शामिल करने के लिए आवेदन कर रहे थे, बल्कि 2003 के बाद से मतदाता सूची में शामिल हुए सभी मतदाताओं से नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ मांगे गए थे.योगेंद्र यादव कहते हैं, “नागरिकता का प्रमाण केवल तब ही मांगा गया जब किसी की नागरिकता को लेकर कोई ऑब्जेक्शन आया हो या फिर सरकार ने किसी ख़ास इलाक़े को घोषित किया हो कि यहां बड़ी तादाद में अवैध विदेशी रहते हैं और उस इलाक़े में कोई नया व्यक्ति आया हो, या सरकार ने ही किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित किया हो.”योगेंद्र यादव कहते हैं, “चुनाव आयोग ने एसआईआर को लेकर ये दावा किया था कि वह 2003 की प्रक्रिया को दोहरा रहा है, यह दावा बिलकुल झूठ है.”चुनाव आयोग ने योगेंद्र यादव के इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. 
